आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहि ये बातें परशुराम सों फिरि बहुपुत्र सिखावनदीन ॥ सुनिकै बातें निज माताकी भीषमकहाबचनछलहीन १०० विजयपत्र जो म्वाहिं लिखिदेवैं तौ हम लौटि धामको जायँ ॥ नाहिं तो टरिहौं ना संगर ते बहुतनधजीधजीउड़िजाय१०१ सुनिकै बातें ये भीषम की औ हठ दीख टरै को नाहिं ॥ तब तो गंगा परशुराम सों बोलींहाथजोरित्यहिठाहिं १०२ लरिका अरुझो विजयपत्र को ओ जमदग्नितनय महराज ॥ विजयपत्र अब याको दीजै कीजैआपशिष्यकोकाज १०३ सुनिकै बिनती बहु गंगाकी तबतिनविजयपत्रलिखिदीन॥ विजयपत्र लै तहँ भीषमने औ पैलगी गुरुको कीन १०४ माथ नायकै फिरि गंगा को भीषम दीन्ह्यो शंख बजाय ॥ परशुराम निज आश्रम गमने भीषम घरै पहुंचे आय १०५ चित्र बिचित्रबीर्य रहें राजा भीषमकेर छोट दोउभाय ॥ तेऊ मरिगे विना पूत के तिनघरब्यास पहुंचे आय १०६ आँधर पांडु बिदुर तिनलरिका जिनकारहा जगतयशछाय ॥ अँधरे केरे दुर्योधन भे पांडुकेभये युधिष्ठिरराय १०७ दोऊ मिलिकै संगर ठान्यो तहँ सब क्षत्री गये बिलाय ॥ भयो परीक्षित फिरि दिल्लीपति ज्यहिभागवतसुन्योहर्षाय१०८ कलियुगआयो त्यही राज में ओ महराज कनौजीराय ॥ को गतिबरणैत्यहि कलियुगकै हमरे बूत कही ना जाय १०६ ऐसी दिल्ली की रजधानी जामें बसै पिथौराराय ॥ रूपउजागर सब गुण आगर शोभाकही तासु ना जाय ११० नित प्रति पूजै शिवशंकेर का नाहर दिल्ली का सरदार ॥ गदका बाना पटा बनेठी इनमाँबहुतभांतिहुशियार १११