आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । १७८ हाल बिसेने जो सुनि पावैं तो यहि डरैं जानसों मार ८५ हल्ला करिकै यह बोलतभै तब हम कहा याहि समुझाय ॥ धीरे बोलै जनवासे में नहिं कहुँ सुनी बिसेनोराय ८६ इतना सुनतै मुहँ मटकायो गारी दियो बनाफरराय ॥ ढोलक नारिन औ शूदन की तुमसों कथा कहौं मैं गाय ८७ जैसे पीटे ढोलक बाजै नारी दशा स्वई है भाय ॥ गगरीदाना शूद उताना यहहू मिला खूब ह्याँ आय ८८ भला तुम्हारो हम नित चाहैं साँची सुनो बनाफरराय ॥ जैसे मैने म्वर ब्रह्मा हैं तैसे तुम्हूँ लहुरवा भाय ८६ घाटि न जानैं हम ब्रह्मा ते कैसी कहौ उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सँगमेंमालिनिलीन लिवाय ६० जहाँ पर बैठे थे आल्हाजी ऊदन तहाँ पहुँचे जाय ॥ कही हकीकति तहँ मालिनिने ऊदन पाती दीन सुनाय ६१ बड़ा शोचभा सुनि आल्हाके मनमें वार वार पछितायँ ॥ हमहीं पठवा था मलखे को तबचलिगयो लहुरवाभाय ६२ दिह्यो अशर्फी बहु मालिनिको कीन्ह्यो बिदा बनाफरराय ॥ मालिनि चलिभै जनवासेते पहुँची फेरि महलमें जाय ६३ कह्योहकीकति गजमोतिनिते ऊदन बोले शीश नवाय ॥ हुकुम जो पावैं हम दादा को तौ मलखे को लवैं छुड़ाय ६४ बातैं सुनिकै ये ऊदन की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ हुकुम लगायो फिरि ऊदन ने डङ्का तुरत दीन बजवाय ६५ बाजे डङ्का अहतङ्का के सबियाँ फौज भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ६६ पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥