भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२४ आल्हखण्ड । १८० तेगा घमकैं बर्दवान के कोताखानी चलै कटार १०९ बड़ी लड़ाई भै भुन्नागढ़ ऊदन सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं नाहर एक एक को ज्वान ११० मानसिंह जगनिक को राजा देवा मैनपुरी चौहान ॥ काँतामल्ल औ बनरसवाला भारी कीन घोर घमसान १११ तीनि सिरोही सूरज मारी ऊदन लीन्ही वार बचाय ॥ साँम उठाई बघऊदनने औ सूरजपर दई चलाय ११२ भागा घोड़ा तब सूरजको लश्कर भागि गयो भयखाय ॥ जहां कचहरी गजराजाकी सूरज तहां पहुँचा जाय ११३ हाथ जोरि औ पायन परिकै राजै बहुत कहा समझाय ॥ बड़े लड़ैया मोहवे वाले तिनकीमारु सही ना जाय११४ सुनिकै बातें ये सूरज की सेमा भगतिनि लीन बुलाय ॥ कही हकीकति सब सेमाते राजा बार बार समझाय ११५ सेमाभगतिनि सूरज लै कै तुरतै कूचदीन करवाय ॥ कूच कराये भुन्नागढ़ ते पथरीगढ़ै पहुँची आय ११६ दीख्यो ऊदन जब सूरज को धावा तुरत दीन करवाय ॥ सेमा बरसी तब जादूको पत्थर सबै फौज है जाय ११७ इकलो देवा बचि लश्करगा आल्हा पास पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब सेमाकी आल्हागये सनाकाखाय ११८ धीरज धरिकै आल्हा बोले देवा नगर मोहोबे जाय ॥ जल्दी लावो तुम इन्द्ल को तासों कह्यो कथासमझाय ११९ इतना सुनिकै देवाठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ सातरोज को धावा करिकै पहुँचा नगर मोहोबा द्वार १२० आल्हा केरे फिरि मंदिर में देवा अटा तुरतही जाय ॥