आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्माका बिवाह । २०७ ११ सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन बोले माथ नवाय ॥ टीका फेरागा दिल्ली का. तौमुँहकौन दिखावाजाय १०६ इतना कहिकै ऊदन ठाकुर तुरतै डारा सांग उखार ॥ ऊदन बोले फिरि ताहर सों नाहर दिल्ली के सरदार १०७ हम तो नौकर परिमालिक के तिन यह डारा सांग उखार ॥ ऐसे नौकर जिनके घरमाँ तिनसे कौन करै तलवार १०८ सुनिकै बातें ये ऊदन की ताहर मनै गयो शर्माय ॥ बीरा दीन्ह्यो ताहर ठाकुर ब्रह्मा बीरागये चबाय १०६ छींक तड़ाका मै सम्मुखमाँ मल्हना रोय उठी घबड़ाय ॥ ब्याह न करिहौं मैं ब्रह्मा का मानो कही बनाफरराय ११० हमैं चाह है नहिं भौरिन कै ना कछु बहू केरि परवाह ॥ इकलौता यहु जीवै जग औ फिरि बनेरहै नरनाह १११ बहुतक अशकुन हम देखे हैं कैसे धरा जाय जिय धीर ॥ पुत्रघाव सों दशरथ मरिगे यासों और कौन जगपीर ११२ भला न देखें यहि ब्याहे में मानो कही वीर मलखान ॥ जो नहिं मानो मलखाने तुम हमरे जाय प्रानपर आन ११३ बातैं सुनिकै ये मल्हना की बोले फेरि बीर मलखान ॥ घरको आवो टीका फेरैं तौसब हँसिहैं देशजहान ११४ बिटिया आहिउ तुम ठाकुर की ठाकुर घरै बियाही माय ॥ नहिं क्यहु बनियाकी महतारी जो मन बारबार पछिताय ११५ हल्दी मिरचा हम बेचैं ना ना हम करैं वाणिज्य व्यापार ॥ हम तो लरिका हैं ठाकुर के औ दिनराति करैं तलवार ११६ धन्य सराहौं हम कुन्ती का आपन दीन्हे पुत्र पठाय ॥ युद्ध मचायो तिन कौरव ते औ यश रहा जगतमें छाय ११७