आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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३० आल्हखण्ड जो कछु भाषा पृथ्वीराज ने सुनी हकीकति जब माहिल सबै बड़ी उदासी सों बोलत भा ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का भेटन आवैं परिमालिक जब इतना कहिकै माहिल चलिभे सुनिकै बातें बघऊदन की ताकत हमरे अस नाहीं है गजभर छाती पृथ्वीराज की रह्यो भरोसे तुम हमरे ना मलखे बोले तब आल्हा ते भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ ऐसी बातें राजा बोलैं अब तुम चलिहौ समध्वारे को हँसिहैं दिल्ली में नरनारी जेठे भाई बाप बरोबरि सुनिकै बातें ये मलखे की ... ठाढ़े पृथ्वीराज जहाँ उतरिकै हाथी के हौदा ते गये सामने जब पिरथी के लखैं तमाशा तहँ नारी नर पिरथी बोले तहँ आल्हा से अब तुम जावो निज तम्बू के सुनिकै बातें ये पिरथी कें