भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

६ आल्हखण्ड । २४४ पनी पियावन अब घोड़े का फेरि न कह्यो दूसरीबार ४५ नरपति राजा यहि नगरी का सबविधि शूरबीर सरदार ॥ टरिजा टरिजा अब जल्दी सों क्षत्री घोड़े के असवार ४६ इतना सुनिकै ऊदन बोले अब ना बोले फेरि गवाँरि ॥ ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुँहँ घाँसिदेउँ तरवारि ४७ नरपति खरपति कै गिनतीना बर बर करै बैजनी नारि ॥ काह हक़ीक़ति है नरपति कै हमरे साथ करै तरवारि ४८ सुनिकै बातें ये ऊदन की सहमी तहाँ तुरत सो नारि॥ औरी नारी त्यहि सों बोलीं आई संग भरन जे बारि ४९ रूप उजागर सब गुण सागर नागर घोड़े को असवार ॥ करुई वाणी नाहक बोलिउ बहिनी मानों कही हमार ५० यहु बर लायक है फुलवा के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ वह तो बोली भल धीरज में पर परिगई बनाफर कान ५१ सवैया ॥ ऊदन बोलिउठा त्यहि नारि सों कौनअहै फुलवा सहिदानी । देहु बताय न राखु छिपाय चुभी मनमें सुनिबे को कहानी ॥ कोमल बैन सुन्यो जब भामिनि बोलिउठी तबहीं यह बानी । नरपतिकी कन्या लखिकै ललिते रतिहू मनमें सकुचानी ५२ त्यहि की समता सुन्दरता की यहिपुर नारिकौन यहिकाल ॥ काह बतावों परदेशी मैं फूलन शयनकरै वह बाल ५३ त्यहिमुख फुलवाकी गाथासुनि ऊदन आगम गयो जनाय ॥ दक्षिण बाहू फरकन लाग्यो दहिने भई शारदा माय ५४ यदि आगैं फिरि माड़ो कै जो कछुकहाविजैसिनिभाल ॥