भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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मुण्डन केरे मुड़ चौरा मे औ रुण्डनके लगे पहार ६६ बड़ी लड़ाई भै नत्वर में मकरँद इन्दल के मैदान ॥ बड़े लड़ैया दूनों ठाकुर रणमाँ करें घोर घमसान ६७ मकरँद बोला तहँ हिरिया ते यहिपर छाँड़ो घोर मशान ॥ इतना सुनतै इन्दल ठाकुर हिरिया पास पहुँचा ज्वान ६८ पकरिकै जूरा त्यहि हिरियाको इन्दल काटिलीन ततकाल ॥ जादू झूठी भईं हिरिया की तुरतै हैगै हाल बिहाल ६६ देखि दुर्दशा यह हिरिया कै मकरँद खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो इन्दल के इन्दल लीन ढालपर वार १०० बचा कुँवरुवा आल्हावाला त्यहिका राखिलीन भगवान ॥ औ ललकारा मकरन्दा को मामा मौत आपनी जान १०१ ढाल कि औझरि इन्दलमारा मकरँद गिरा मूरछाखाय ॥ उतरिकै घोड़ी ते मलखाने तुरतै मुशकलीन बँधवाय १०२ मकरँद बँधिगे समरभूमि में भगिगे सबै सिपाही ज्वान ॥ कोउन रहिगा त्यहि समया में जो क्षण एक करै मैदान १०३ कूच करायो आल्हा ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ खबरि पाय कै नरपति राजा तुरतै गयो सनाकाखाय १०४ कछू न सूझी तब नरपति को अपने मंत्री लये बुलाय ॥ मंत्र पूँछिकै तिन मंत्रिन सों आल्हा पास पहुँचे आय १०५ हाथ जोरिकै नरपति बोले मानो कही बनाफरराय ॥ कैद छुड़ायो सुत हमरे की अपने शूर लेउ छुड़वाय १०६ बेटी ब्याहैं हम ऊदन को सुख सों लौटि मोहोवे जाउ ॥ दगा जो राखै तुम्हरे सँग माँ नरपति कह्यो हमारो नाउँ १०७ सुनिकै बातें ये नरपति की आल्हा मकरँद दीन छुड़ाय ॥