भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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चन्द्रावलि की चौथ । २६१

तुम चलिजावो अब बगियाको जहँपर टिका बनाफरराय ८३ आदर करिकै नरनाहर को जल्दी लावो इहाँ बुलाय ॥ इतना सुनिकै बुला जुरावर अपने मित्रन सों हर्षाय ८४ पाग बैंजनी सब कोइ बाँधिये जामा हरे रंग को भाय ॥ एकै बाना एक निशाना मिलिये उदयसिंहकोजाय ८५ देखें किसको पहिले भेंटैं नाहर उदयसिंह सरदार ॥ इतना सुनिकै सब मित्रनने एकै रंग कीन श्रृङ्गार ८६ पंद्रा सोला एकै रंग के बगिया तुरत पहुँचे जाय ॥ एकै रंगके सब क्षत्री हैं नहिंकोउ रावरङ्ग दिखराय ८७ मिले जुरावरको ऊदन तब निश्चय राजपुत्र अनुमान ॥ देखि चतुरता उदयसिंह की सोऊ मनै बहुत शरमान ८८ औ फिरि बोला उदयसिंह ते तुमको नृपति बुलावा भाय ॥ इतना सुनिकै बघऊदन तब साथै कूच दीन करवाय ८६ नचै बेंदुला तहँ मारग में अद्भुत कला रहा दिखराय ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे यहु रणबाधु बनाफरराय ६० बैठ सिंहासन महराजा जहाँ पहुँचा उदयसिंह तहँ जाय ॥ चरण लागिकै महराजाके ठाढ़े भये शीशको नाय ६१ पकरिकै बाहू तब ऊदन की तुरतै लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ बड़ी खातिरी करि ऊदनकी अपने पास लीन बैठाय ६२ चिट्ठी दीन्ह्यो चंदेले की लीन्ह्यो बीरशाह हर्षाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी परिमालिक की मनमाँ बड़ा खुशी द्वैजाय ६३ जो कछु सामा मर्दानाथी ऊदन सबै दीन मँगवाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के फूले अंग न सका समाय ६४ राजा बोला फिरि ऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥