भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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चन्द्रावलि की चौथ। २६३ ११ बिदाकरैहैं ये बेटी को दासी अपनि बनैहैं जाय १०७ खबरि पायकै परिमालिक ने हमको तुरत दीन पठवाय ॥ बिदाकरैहैं जो बघऊदन तौ सब जैहैं काम नशाय १०८ ईजति जैहै दोऊ दिशिकी साँचे हाल दीन बतलाय ॥ जहर घोरावो तुम भोजन में औ ऊदन को देउ खवाय १०६ बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषधि वहै बलाय ॥ चरचा कीन्ह्यो नहिं ऊदन ते मानो साँच यादवाराय ११० इतना कहिकै माहिल ठाकुर चलिभा करिकै राम जुहार ॥ हुकुम लगायो महराजा ने महलन भोजन होयँ तयार १११ फेरि बुलायो सब पुत्रन को माहिल कथा कह्यो समुझाय ॥ बात लेन को ऊदन आयो भोजन जहर देउ डरवाय ११२ छली धूर्त्त को या बिधि मारै तौ नहिं दोष देय संसार ॥ खबरि जनाई फिरि महलन में भोजन बेगि भये तय्यार ११३ भयो बुलौवा फिरि भोजन का ऊदन लीन ढाल तलवार ॥ देश हमारे कै रीती ना भोजनकरै बाँधि हथियार ११४ शंका लावो कछु मन में ना नाहर उदयसिंह सरदार ॥ बातें सुनिकै बहनोई की ऊदन धरी ढाल तलवार ११५ जायकै पहुँचे फिरि चौकापर नाहर देशराज के लाल ॥ साथै बैठे बहनोई के रखे गये परोसे थाल ११६ रक्षक सबको जग एकै है पूरणब्रह्म चराचर सम ॥ करै चाकरी नहिं अजगर क्यहू पक्षी करै न केहू काम ११७ अथवा जानो यह साँची तुम मछलिन कौन देय आहार ॥ ताल सुखाने चर्पी भूमि में रक्षा करैं राम भर्त्तार ११८ भै रघुनन्दन कै दाया तब ऊदन लीन्ह्यो थाल उठाय ॥