भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२८ आल्हखण्ड । सवैया ॥ तीर छूटैं पृथुराज कमान सों ते बहु शूरन के शिरकाटैं। भूमिअकाशनदेखिपरे शिरऔभुजसों सबही दिशिपाटैं ॥ मत्त गयन्द गिरैं हहराय बजायकै ताल सबै नर डाटैं। शूरनकी ललकार सुने ललिते सब कायरके हियफाटैं ३९ भये सनाका कायर मनमाँ शूरन रहा मोद अतिछा बड़ी लड़ाई भै कनउज माँ कोउ रजपूत न रोकै पारे रकतकिनदियातहँवहिनिकरी जूझे बड़े बड़े सरद हाथी गिरिगे आस पास माँ सोहैं मानो नदी कगा छूरी मछली सम सोहत भईं ढालैं कछुवा सम उतर भुजा औ जाँधैं रणशूरन की गोहैं सरिस बही तहँ जा बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे तहाँ वार उतर बहैं लहासैं जो शूरन की तिनमाचढ़े गिद्धलगजाये जैसे डेंगिया माँ चढ़िकै नर खेलैं नदी नेवारा उ तैसे लहासैं रण शूरनकी तिनपरचील्ह काग उतरा तीन दिनौना याविधि गुजरे तहँपर खूब चली तल ना ई हारे दिल्ली वाले ना उइ कनउज के सरद आगे बढ़िकै पृथुइराज ने गरुई हांक दीन लल बात हमारी तुम सुनिलेवो राजा कनउज के सरद डोला मँगावो संयोगिनि को सो रण खेलन देउ ध जीति विधाता जाको देई सो डोलाको ल्यई उठा बाम्हन केरी बहुवस्ती है ओ महराज कनौजी होई लड़ाई पुर भीतर में परजै दुःखमिली अधिक