आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header] इन्दलहरण । ३२६ १३
सवैया ॥ रागवही ज्यहि रामबसै अरुध्यान वही जो धनी के घेरेका । प्रीति वही जो सदा निबहै अरु दाग वही कटु बचनकहेका ॥ सुखसम्पत्ति अनेक भरी पर आवै नहीं कोउ काम परेका । काहेकोआदम शोचतहै कोउ मित्रनहीं है विपत्ति परेका १२६ ठाकुर वही जो दुख सुख बूझै सेवक वो मनलाग रहेका । भाई वही जो भारहि खैंचत पुत्र वही परिवार बढ़ेका ॥ नारी वही जो जरै पियके सँग शूर वही सनमुखखलड़ेका । सम्पत्तिमेंतो अनेकमिलैं पर मित्रवही जो विपत्ति परेका १२७
इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कही समय की बात ॥ अब मन भाई यह हमरे है नरवर चलैं आजहीतात १२८ यह मन भाय गई देवाके दोऊ भये बेगि तय्यार ॥ सात रोजकी मैजलि करिकै नरवर पहुँचिगये सरदार १२६ यह सुधि पहुँची जब मोहबे में आल्हा तजा लहुरवाभाय ॥ बारहु रानिन सों परिमालिक महलन गिरे मूर्च्छाखाय १३० तुरत पालकी को मँगवायो दशहरिपुरै पहुँचे जाय ॥ औधिरकात्यो भल आल्हा को रहिगा चुप बनाफरराय १३१ कायल हैगे आल्हाठाकुर राजा लौटि परा पछिताय ॥ ऊदन बैठे ह्याँ कुँवना पर हिरिया गई तहाँ परआय १३२ देखिकै सूरति बघऊदन कै हिरिया गई तुरत पहिंचान ॥ हँसिकै हिरिया बोलन लागी साँचीसुनोबनाफरज्वान १३३ कौनि मुसीबत तुमपर परिगै जो तजि दियो ढालतलवार ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनिठीककहैयहिवार १३४