आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३३१ १५ करौं तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १४७ इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृतऊदननरवरगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ कौनफली सबकाल बली यहि पुण्यथलीमनमाँझ बिचारा । निंदिकै काहि बखानकरौं क्यहि कौनसों बैरकरौं यहिब्वारा ॥ याहि लियों ठहराय मनै प्रभु एकसों एक हैं देव उदारा । बेद पुराण बतावत हैं ललिते सब ते बढ़िकै ॐकारा १ सुमिरन ॥ इकलो अक्षर ॐकार को अब हम शिरसों करें प्रणाम ॥ ब्रह्मा विष्णू औ शिवशंकर दुर्गा केर ताहि में धाम १ एक मात्रा में शिवशंकर दुर्गा अर्द्ध करें विश्राम ॥ एक मात्रा में ब्रह्माजी एक म रहें हमारे राम २ इकलो अक्षर यहु जो ध्यावै पूरण होयँ तासु के काम ॥ यहिते बढ़िकै हिन्दूमत में दूसर नहीं बेद में नाम ३ अज अविनाशी घट घट वासी पूरण ब्रह्म चराचर राम ॥ बेद व्याकरण दोउ साखी हैं खण्डनकरै कौन यह नाम ४ नाम न रहै जब दुनियाँ मा तब सब होइहैं पशू समान ॥ कीरति गावों बघऊदन कै सुनिये खूब ध्यान धरिज्ञान ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदयदिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगत उजियारा। सोयकै जागे बघऊदन तब प्रातःकृत्य कीन सरदार १