आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३३५ १६ ऊदन मकरँद को रानी लखि खातिरफेरिकीनअधिकाय ३७ रानी पूछा फिरि मकरँद ते योगी बन्यो पूत कस आय ॥ इतना सुनिकै मकरँद ठाकुर इन्दलहरण गयोसबगाय ३८ सुनिकै बातें सब मकरँद की रानी बार बार पछिताय ॥ लिखी विधाता की मेटै को औ दैवागतिकही न जाय ३९ पूत सपूतौ इन्दल खोयो मातै पितै दुःख अधिकाय ॥ विधिना डारे अस बिपदा ना कोउ न सहै पुत्रका घाय ४० भरे घुचघुचा सुनि ऊदन के नैनन नीर परे दिखराय ॥ उठिकै ऊदन रनिवासे ते देबी धाम पहुँचे आय ४१ बैठिकै मठियामा बघऊदन सुमिरयो तहाँ शारदामाय ॥ ध्यान लगायो जगदम्बा का सब अवलम्बा दीनभुलाय ४२ शोच भूलिगा तब ऊदन का मनमाँ खुशीभई अधिकाय ॥ तहँते चलिकै बघऊदन फिरि महलन अतातुरतही आय ४३ बनी रसोई रनिवासे में भोजन कीन सबन सुखपाय ॥ राति अँधरिया फिरि आवत भै सोये बिकट नींदको पाय ४४ बलखबुखारे निशि स्वप्ना माँ पहुँचा देशराजका लाल ॥ सोयकै जाग्यो बघऊदन जब लाग्यो सबतेकहनहवाल ४५ बलखबुखारे के जैबे को तीनों वीर भये तय्यार ॥ कान्तामल्हू सँग में हैगा चारों चलतभये सरदार ४६ अटक उतरिकै काबुल हैकै पहुँचे बलखबुखारे जाय ॥ शहर पनाहै चौगिर्दा ते बड़बड़महलपरै दिखलाय ४७ साँचे योगी चारो बानिकै पहुँचे शहर बीच में आय ॥ बाजी खँझड़ी तहँ देवा की मकरँद डमरु रहा बजाय ४८ कर इकतारा कान्तामल के ऊदन बाँसुरी रहा बजाय ॥