भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 357

२ आल्हखण्ड । ३५४ तैसे कीरति यदुनन्दन की द्वापर फैलिगई अधिकाय ॥ सूर औ मीराबाई कलियुग पायो स्वाद भूमिमें आय ४ ललिते चक्खन को ललचायो गायो आल्हा छन्द बनाय ॥ कहौं निकासी अब आल्हा कै सुमिरन देवनको बिसराय ५ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समइया की बातैं हैं यारो मानो कही हमार ॥ लिल्ही घोड़ीपर चढ़ि बैठो माहिल उरई का सरदार १ तिकृतिकृतिकृतिकूटिटुईहाँकत दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥ लागिकचहरी दिल्लीपति की जिनका कही पिथौराराय २ आवत दीख्यो तिन माहिलका अपने पास लीन बैठाय ॥ बड़ी खातिरी करि माहिल कै पूँछन लाग पिथौराराय ३ काहे आये उरई वाले आपन हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो पिथौराराय ४ मलखे सुलखे आल्हा ऊदन इनका दीखे देश डेराय ॥ आज बनाफर की समता को ठाकुर आन नहीं दिखलाय ५ चार चौहदी के डाँड़े पर मलखे किलालीन बनवाय ॥ जो कछु चाहैं आल्हा ऊदन सो सब करिकै देयँ दिखाय ६ कौन दूसरिहा है आल्हा का सम्मुख बात करै जो जाय ॥ मान न रहिगे क्यहु नरेश के चारो बढ़े बनाफरराय ७ हमका मानैं भल मामा करि खातिर करैं रोज अधिकाय ॥ हमहूं जानत हैं ब्रह्मा सम राजन साँच दीन बतलाय ८ अधिक पियारे पै तिनते तुम मानो कही पिथौराराय ॥ तुम्हें लरिकईं सों जानत हौं सीधो सादो आप स्वभाव ६ तिनकी धरती का स्वामी मैं त्यहिका पास लियो बैठाय ॥