आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयंम्बर । ३३ दिल्ली केरे तब फाटक पर भारी भीर भई तहँ आय॥ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ रहिगे पैर जमाय ६७ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं मानैं कोऊ नहीं तहँ हारि॥ वसरिन वसरिन याविधि खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ६८ बैस बराबरि है दोऊ कै दोऊ बड़े लड़ैया ज्वान॥ पृथुइराज औ जयचँदराजा येऊ करैं घोर घमसान ६६ शयलंगरी हिरासिंह ठाकुर येऊ खूब करैं तलवारि॥ अपने अपने सब मुर्चन में मानैं कऊ न नेको हारि १०० मारो मारो भुजा उखारो सब दिशि यहै रहे चिल्लाय॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जनकरैं भूत तहँ आय १०१ स्यार औ कुत्तनकी बनिआई कागन लागी कारि बजार॥ चील्ह गीध ये सउदा लै कै अपने घरका भये तयार १०२ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ बीर करैं मैदान॥ हनि हनि भाला दोऊ मारैं नहिं भयकरैं नेकहू ज्वान १०३ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार॥ रतीभानने त्यहि समया माँ हाथमलीन नांगि तलवार १०४ सवैया॥ जूझिगये बहु शूर अपार बही तहँ शोणित की अतिधारा। गावत चामुँड नाचत योगिनि प्रेत बजावत हैं करतारा॥ जोर बह्यो रतिभानकी खड्ग सो घोर मच्यो तहँ पै हहकारा। जात चढ़े शव ऊपर गृद्ध मनौं ललिते जल खेलैं निवारा १०५ को गति वरणै त्यहि समया कै हमरे बून कही ना जाय॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय १०६