भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

॥ श्रीगणेशाय नमः॥ अथ आल्हखण्ड ॥ सिरसाकासमरवर्णन ॥ सवैया ॥ ध्यावत तब पद कंज शिवा मनभावत दे वरदान भवानी । तवपति भंग नशे में परे अरु गावत गीत हरी हरि वानी ॥ नाहिं सुनय बिनती ललिते यह साँचहु साँचहु साँच बखानी । दे मृगनयनी कि दे मृगछाल यहै हम चाहत हैं शिवरानी १ सुमिरन ॥ सुमिरि भवानी शिवरानी को सिरसा समर करौं विस्तार ॥ नैया डगमग भवसागर में माता तुम्ही निबाहन हार १ आदि भवानी महरानी तुम तुम बल सृष्टि रचैं करतार ॥ परम पियारी त्रिपुरारी की धारी देह जगत उपकार २ पुत्र षडानन गजआनन हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ प्रथमँ सुमिरैं गजआनन को होवैं सकल तासु के काज ३ सुमिरि षडानन का दुनियामाँ लाखन सिद्धभये द्विजराज ॥ मलखे पृथ्वी के संगर को वर्णन करौं सुमिरि रघुराज ४