आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४४५ ३१ तौ तौ लौरिका परिमालिक का नहिंई मुच्छ डरों मुड़वाय २० इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपने कहा सिपाहिन टेर ॥ जान न पावैं मोहबेवाले मारो एक एक को घेर २१ सुनिकै बातें ये सूरज की क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर मदनताल पर लाग्यो होन भड़ाभड़मार २२ पैग पैग पर पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार २३ को गति वरणै तहँ अझई कै मारे ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार ॥ रंजित लड़का परिमालिकका दूनों हाथ करै तलवार २४ सूरज ठाकुर दिल्लीवाला आला समरधनी चौहान ॥ गनि गनि मारै रजपूतन का कीरतिसागर के मैदान २५ रंजित सूरज द्वउ ठकुरन का मुर्चा परा बरोबरि आय ॥ दोऊ सोहैं भल घोड़न पै दोऊ रूपशील अधिकाय २६ सूरज मारै जब रंजित का दाहिन बाँउ खेलि तब जाय ॥ रंजित मारै जब सूरज का सोऊ लेवै वार बचाय २७ उसरिन उसरिन दोऊ खेलैं पानी भरै यथा पनिहार ॥ कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २८ सवैया ॥ सिंह समान सो रंजित वीर औ सूरजहू बल घाटि कछूना । मार अपार भई ललिते पै उदारन के मन शङ्क कछूना ॥ शक्ति औ शूल चलै तलवार सो मार कही कहिजात कछूना । रक्त कि धार अपार बही पर हार औ जीत लखात कछूना २९ सब्जा घोड़े पर रंजितहैं सूरज सुरखा पर असवार ॥