आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४७६ १७ सवैया ॥ स्वस्थिर चित्त बिचार करौ यह नाथ सबै बिधि बात अनैसी । रूप औ यौवन छाँड़ितिया सोपिया क्यहिभांतिकहौ तुमऐसी॥ धीरजवन्त कुलीनन की गति नाथ विचारि कहौ तुम कैसी । बात सुहात नहीं ललिते अनरीतिकि प्रीतकरी तुम जैसी १७७ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ कउने गँवार की बिटियाहै हमते टेढ़ि मेढ़ि बतलाय १७८ ऐसी बातें अब बोलेना दशनन चापि जीभको लेय ॥ जो नहिं जावैं सँग ऊदन के तौसबजगतअयशकोदेय १७६ कहा न मानैं हम काहू को निश्चय जानु मोर प्रस्थान ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बोली स्वामी करो बचन परमान १८० राति बसेरा करि महलन मा भुरहीं कूच दिह्यो करवाय ॥ अम्बरे संगकी सखी सहिलरी डुइइइ बालकरहीं खिलाय १८१ दुनियादारी कछु जानी ना कबहुँ न धरा सेज पै पायँ ॥ कैसे काटब हम यौवन का प्रीतम साँचदेउ बतलाय १८२ तुम्हें मोहेबे का जाना रह नाहक लाये गवन हमार ॥ मई बाप का फिरि गरिआवै दैके बार बार धिक्कार १८३ सुनि सुनि बातें ये पदमिनिकी बोला फेरि कनौजीराय ॥ लौटि मोहोबे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८४ द्वार बनाफर उदयसिंह हैं रानी मोह देउ बिसराय ॥ संकट टारे बिन मल्हना के हमको योग रोग दिखलाय १८५ साथ बनाफर के हम जैहैं अइहैं जीति पिथौरा राय ॥ कीरति गैहै सब दुनिया मा रानी संग करब तब आय १८६