आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनदीबेतवाकासमर । ५०७ १५ शंक नहीं निरशंक फिरै यहु बंक है ठाकुर ठीक बखाना । काह बखान करै ललिते गुणवान जहान यही हम जाना १५२ बड़ा प्रतापी रणमण्डल मा ठाकुर उदयसिंह सरदार ॥ बहु दलमारा पृथीराज का नदिया बही रक्तकी धार १५३ मारत मारत दल बादल के तब लखिपरे वीर चौहान ॥ बिषधर शायक इक हाथेमा इक लोहेकी गहे कमान १५४ तहँईं दीख्यो लखराना को तब मन ठीक लीन ठहराय ॥ शब्द भेद शर हनै पिथौरा कैसे बचै कन्नौजीराय १५५ जो मरिहैं लाखनि राना तौ सब जैहैं कामनशाय ॥ जो सुनि पैहैं तिलका रानी तौ मरिजाएँ जहरकोखाय १५६ नहीं आसरा यह लाखनि का जो अब धरैं पछारी पायँ ॥ शूर शिरोमणि सबविधि साँचे हमरे मित्र कन्नौजीराय १५७ साम दाम अरु दण्ड भेद ये चारों अङ्ग नीतिके आयँ ॥ इनसों लड़िकै सज्जन क्षत्री पावैं विजय समरमें जाय १५८ यहै सोचिकै ऊदन क्षत्री आपन घोड़ दीन दौराय ॥ जहँपर हाथी पृथीराज का ऊदन अटा तड़ाका धाय १५९ हाथ जोरिकै ऊदन बोले ओ महराज पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी करो समर में आय १६० ना चढ़ि आये जयचँद राजा ना चढ़िआये राजापरिमाल ॥ राजा राजा का रण सोहै मानो साँच बात नरपाल १६१ लड़िका लाखनि तुम्हरे आगे तिन पर कैसे गहौ कमान ॥ बातें सुनिकै बघऊदन की रहिगा चुप्प साधि चौहान १६२ ऐंड़ लगावा फिरि बेंदुल के हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥