भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१ आल्हखण्ड । ५२० डिब्बा दीख्यो नहिं जेवर को सुनवाँ गई सनाकाखाय २३ तुरत बनाँफर उदयसिंह को अपने पास लीन बुलवाय ॥ कहि समुझावा तहँ ऊदन ते डिब्बा नहीं परै दिखलाय २४ एक लाख का सब गहना है कैसी करैं बनाफरराय ॥ डिब्बा भूलाहै बिठूर मा मोको याद भयो यहँ आय २५ काह बतावों मैं देवर ते करिये कैसो कौन उपाय ॥ धीरज राखो अपने मनमा बोले वचन ल्हुरवाभाय २६ तुरत बुलायो जगनायक को औ सब हाल कह्यो समुझाय ॥ हम तो जावत हैं बिठूर को तुम अब कूचजाउ करवाय २७ यह मन भायगई जगना के ऊदन गये बिठूरै आय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै जगना अटा मोहोबे जाय २८ रहा न मेला कछु लौटेमा सिरकी पाल परे दिखराय ॥ तिनमा नटिनी औ नट ठहरे गे तिन पास बनाफरराय २६ सुभिया दीख्यो जब ऊदन का भै मन खुशी तबै अधिकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ ठाकुर हाल देउ बतलाय ३० सुनिकै बातें ये सुभिया की बोले फेरि बनाफरराय ॥ नगर मोहोबा के हम ठाकुर आयन आजु बिठूर नहाय ३१ जब तुम नाचन गइ तम्बूमा गहनो गयो हमार हिराय ॥ पतालगावन त्यहि आयन है तुमते साँच दीन बतलाय ३२ इतना सुनिकै सुभिया बोली मानो साँच बनाफरराय ॥ पँसासारी हमते खेलो हम फिरि पतादेवलगवाय ३३ खेल पसारा सुभिया बेड़िनि बैठे तहाँ ल्हुरवाभाय ॥ जुआँ युद्धसों साँचे क्षत्री कबहूँ न धरैं पछारी पाँय ३४ नल औ पुष्कल आगे खेल्यो झेल्योदुःख नृपति अधिकाय ॥