आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध। ५५६ ' १७ आदि भयङ्कर के ऊपर ते गरुई हाँक देय चौहान १७४ मारो मारो ओ रजपूतो डोला लेवो तुरत छिनाय ॥ जान न पावैं द्यावालिवाले इनके देवो मूड़ गिराय १७५ गरुई हाँकै सुनि पिरथी की जूझन लागि सिपाही ज्वान ॥ उड़ै बेंदुला बघऊदन का खाली होत जात मैदान १७६ धाँधू धनुवाँ के मुर्चा में बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अंगद राजा के मुर्चा मा सय्यद बनरसका सरदार १७७ औरो क्षत्री समरभूमि मा दूनों हाथ करैं तलवार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै अद्भुत होय तहाँपरमार १७८ पैग पैग पै पैदल गिरिगे दुइ दुइ कसी गिरे असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १७६ सोहैं लहासैं तहँ हाथिन की छोटे पर्वत के अनुहार ॥ परी लहासैं जो घोड़न की तिनकोजानों नदीकगार १८० मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ डोला सौंप्यो फिरि धनुवाँको चलिभाकनउजकासरदार१८१ जौनी दिशिको लाखनि जावैं तादिशि होय घोरघमसान ॥ बड़े लड़ैया दिल्ली वाले ताहर समरधनी चौहान १८२ हनि हनि मारैं रजपूतन का घायल होयँ अनेकनज्वान ॥ मान न रहिगा क्यहु क्षत्रीका सब के टूटिगये अरमान १८३ फूटि फूटि शिर चूरण ह्वै गे पूरण भयो समर मैदान ॥ कहँलग गाथा त्यहि समयाकै ललिते करैयहांपर गान १८४ सो भल जानतहैं नीकी बिधि जो यह दीख्यो युद्ध ललाम ॥ सम्मुख जूझैं जे मुर्चा में ते सब जायँ रामके धाम १८५ यही तपस्याहै क्षत्री कै सम्मुख लड़ै समर मैदान ॥