भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 618 में से

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पृष्ठ 567

२ आल्हखण्ड । ५६६ चढ़ै तरंगै जब भांगन की आँगन देखि परै सुरलोक ॥ दुख नहिं ब्यापै कछु देहीमा मनके छूटिजात सब शोक ४ भाँग घोटिकै नित प्रति पीवै जीवै वर्ष एक शत एक ॥ हर को ध्यावै तब सुखपावै पूरी होय तबै यह टेक ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाखा सुनो शूरमन क्यार ॥ बेला काटी शिर ताहर का सोई गाथ कहौं विस्तार ६ अथ कथाप्रसंग ॥ जहाँ चँदेले ब्रह्मा ठाकुर बेला गई तहाँ पर धाय ॥ बैठी पलँगा कर पंखालै लागी करन पवन सुखदाय १ ज्वरि २ बहियां हरि २ चुरियाँ शोभा कही बूत ना जाय ॥ शची मेनका की गिन्ती मा बेला रूप राशि अधिकाय २ यहु अलवेला ब्रह्मा ठाकुर बेलै बोला वचन सुनाय ॥ टरिजा टरिजा री आँखिनते दीखे गात सबै जरिजायँ ३ घटिहा राजा की कन्या ते कासुखहोय मोहिंअधिकाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी कहौ चँदेलेराय ॥ राज कुटुँब सब अपनो तजिकै आइन चरण शरणमें धाय ५ सुनि सुनि बातैं अब प्रीतमकी छाती घाव होत अधिकाय ॥ परवश कन्या की गति जैसी तैसी रही चँदेलेराय ६ ऐसी तुमको अब चहिये ना जैसी सूखी रहे सुनाय ॥ सुरपुर अहिपुर नरपुर माहीं प्रीतम कौन मोर अधिकाय ७ प्यारे प्रीतम इक तुम्हीं हैं। साँचो साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि चँदेलाराय ८ मूड़ काटिकै अब ताहरका प्यारी मोहिं देउ दिखलाय ॥

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