भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१६ आल्हखण्ड । ५८० हुकुम सुनावा महराजा का सत्रियाँ हाल कहा समुझाय १६५ लौटिकै मोर्चा ते आवब जब तुम्हरो करब मनोरथ आय ॥ ऐसे कहिकै ताहर नाहर चलिभे बहुत भांनिसमुझाय १६६ आये फ़ौजन में रण नाहर डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजत डंका अहर्तंका के लश्कर कूच दीन करवाय १६७ चढ़ि दलगंजन की पीठि मा मनगा श्रीगणेश पद ध्याय ॥ बन्दन कीन्ह्यो पितु चरणन का चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६८ प्राण निछावरि फिरि मनते करि चलिभा दिल्ली राजकुमार ॥ गर्जत तर्जत लर्जत आवत नाहर दिल्ली का सरदार १६६ आयकै पहुँचा समर भूमि मा गरुई हाँक कहा ललकार ॥ लेय चँदेला अब अधकर को आयो दिल्ली राजकुमार १७० सुनिकै बातें ये ताहर की बेला मोहवे का सरदार ॥ असल जनाना मर्दाना जो ठाना समर आय त्यहिवार १७१ पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलन लागि तलवार ॥ सब हथियारन में तलवारी याही धर्मरूप अवतार १७२ आरयसाही जे उत्साही गाही धर्म युद्ध के यार ॥ तौन सिपाही बेपरवाही छाँड़े प्राण आशा त्यहिवार १७३ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़काटैँ पाटैँ मुण्डन भूमि अपार ॥ मुरि २ गिरि २ लरि २ कितन्यो जूझन लागि शूरसरदार १७४ झम् झम् झम् झम् भाला वरसैँ तरसैँ घाव देखि जिययार ॥ भम् भम् भम् भम् क्षत्री भमकैँ चमकैँ चमाचम्मतलवार १७५ गम् गम् गम् गम् ढोलक गमकैँ दमकैँ शक्ति शूल विकराल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल १७६ जूझे क्षत्री दुहुँ तरफ़ा के नदिया बही रक्त की धार ॥