आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ बेलाकेसतीहोनेकेसमयकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ भक्तन हेतु सबयं तनुधारि सदा बिपदा सुरसाधुहरी । हिरणाकश्यप दुःख दियउ तब रूपकियो नरसिंह हरी ॥ प्रह्लाद विभीषण औ हनुमान महानन में इन रेखपरी । अँवरीष औ अंगद की समता ललिते जगमें अब कौनकरी १ सुमिरन ॥ तुम्हैं विनायक मैं सुमिरत हौं गणपति गणाध्यक्ष महराज ॥ बिघन हरण लम्बोदर स्वामी पूरणकरो हमारे काज १ हे जगतारण भवभय हारण स्वामी एकदन्त महराज ॥ विपति विदारण सब सुखकारण राखनहार जगतमें लाज २ तुमहीं ब्रह्मा औ विष्णु हौ तुमहीं शम्भु सुरासुर काल ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी शिवाशम्भु के बाल ३