आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] बेलासती अन्त मैदान । ६११ ७
आवत देख्यो लखराना को बोल्यो तुरत पिथौराराय ५८ आवो आवो लाखनिराना हमरे संग मिलौ तुम आय ॥ हमरी सरवरि को तुमहीं हौ ओ महराज कनौजीराय ५६ नीच बनाफर उदयसिंह है तासँग काहगयो बौराय ॥ सोलह रानिन के इकलौता नाहक प्राण गँवायो आय ६० अबै मामिला कछु बिगरा ना मानो कही कनौजीराय ॥ हमै सोच है इक कनउज का की निर्वंश राज है जाय ६१ बृद्ध चँदेले जयचँदराजा मानो कही कनौजीराय ॥ सात पुत्र रण खेतन जूझे हमखोवंश नाश भय आय ६२ अस नहिं चाहें जस हम हैंगे मानो कही कनौजीराय ॥ उमिरि तुम्हारी अतियोरी है कच्ची बुद्धि गयो बौराय ६३ दोष हमारो सब कोउ दैहें बालक हना पिथौराराय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत है कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६४ हमरी तुम्हरी कछु अटनस ना जो रण प्राण गँवावो आय ॥ काह बिगारा हम जयचँद का कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६५ सुखनहिंदेख्यो कछु दुनियाका नाहक प्राण गँवावो आय ॥ अब नहिंकैहैं कछुलाखनिहम कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६६ ताहर नाहर की समता हौ कच्ची बुद्धि गयो बौराय ॥ जो नहिं आवो हमरे दल में तौ अब कूच जाउकरवाय ६७ पारस पैहौ जो दल ऐहौ कनउज गये प्राण रहिजायँ ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही पिथौराराय ६८ तुम्हरी बातें सब साँची हैं सो हम जानि दीन विमराय ॥ पै अब बदला संयोगिनि का लेबे समर भूमि में आय ६६ यामें संशय कछु नाहीं है मानो साँच पिथौराराय ॥