भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 617

१२ आल्हखण्ड । ६१६ जो नहिं अनुचितकरुदुनिया में तौनहिंहोयसजायहिराज ११८ इन रजधानी में रहिकै मैं कबहुँनकष्ट सहा क्यहुकाल ॥ पिता पितामह औ मोसंयुत कबहुँनपर्यनबिपतिकेजाल ११९ चोर छिनारन बदगासन की पिंडुरी थहर थहर थर्थायँ ॥ मोढ़ा टेवै सज्जन बैठे नहिंकहुँमसातलकभन्नाय १२० यह सब गावत हैं सज्जन मन नित प्रति बना रहे यह-राज ॥ जीवैं रानी महरानी ई जिनवलसुजनसुखीसवसाज १२१ इनअसिमाता अब मिलिहैं ना यह मन नित्त लीन ठहराय ॥ मिलैं प्रबन्धौ असकर्त्ता ना जसकछुआजकाल्हादिखलायँ १२२ यहौ कथा अब पूरण करिकै ललिते करत मंगलाचार ॥ करों वन्दना मैं तुलसी की हुलसीजासु काव्यसंसार १२३ ज्यहि अवलोकन के करतैखन मनके छूटि जात सब ताप ॥ सोई प्यारी तुलसी गाथा ललितेकीनबहुतदिनजाप १२४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीन परचाय १२५ पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैहै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरिभगवन्त १२६ इति श्रीलखनऊनवासि(सी,आई,ई)मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत वेलासती व्याख्यावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ वेलासती अर्थात सर्वआल्हखण्डसमाप्तशुभमस्तु ॥ इति ॥