आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ६३ १५ मल्हना रानी के महलन में तुरतै गये बनाफरराय २६ हाथ जोरि औ बिनती कैकै बोला बचन उदयसिंहराय ॥ जावैं माता हम माड़ो को आयसु आपु देउ फरमाय २७ मोहिं आज्ञा महराजा की माया आपु देउ बिसराय ॥ दाया करिकै म्वरे बालक पर माता हुकुम देउ फरमाय २८ सुनिकै बातें ये ऊदन की रानी गई सनाकाखाय ॥ काह विधाता की मरजी है ऐसो कहै लहुरखा भाय २९ यहै सोचिकै मन अपने मा औ सूर्यनको शीश नवाय ॥ मल्हना बोली बघऊदन ते हमरे सुनो बनाफरराय ३० बिटिया बनियां की आहिन ना जो रण सुनिकै जायँ डेराय ॥ जौनि आज्ञा महराजा की आयसु स्वई बनाफरराय ३१ सवैया ॥ जावहु पूत लड़व गढ़ माड़व आवो जीति यही हम चाहैं। सिंहिनि मातु नहीं मन सोच सदा यह वेद पुराणहु काहैं ॥ धर्म कि मारग जेई चलैं सुख तेई सदा जग में निरबाहैं। बाप तुम्हार हन्यो करिया ललिते त्यहि मारो तबै सुखलाहैं ३२ बातें सुनिकै ये मल्हना की बोले तुरत बनाफरराय ॥ आठ महीना की मुहलत दे नवयें चरण पूजिहौं आय ३३ वादा सुनिकै बघऊदन का मल्हना बिदा कीन हर्षाय ॥ पाँचो चलिभे फिरि महलन ते औ लश्कर में पहुँचे आय ३४ तुरत नगड़ची को बुलवायो सय्यद बनरस का सरदार ॥ बजै नगाड़ा अब मोहबे मा सबियाँ फौज होय तय्यार ३५ हुकुम पायकै सो ताल्हन को दौड़त चला नगड़ची जाय ॥