भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

माड़ोका युद्ध । ६६ २१ को गति वरणै तहँ योगिन कै शोभा कही बूत ना जाय ६४ लिहे बांसुड़ी सबसों आगे सनमुख गयो उदयसिंहराय ॥ बायें हाथ सों कीन वन्दगी मन में ध्याय शारदामाय ६५ देखिकै तुरतै राहूट द्वैगा जम्बै माड़ो का सरदार ॥ सनमुख ठाढ़े त्यहि योगी को गरुई हांक दीन ललकार ६६ कउने गँवारे के चेला हौ योगिउकियो शत्रु का काम ॥ जउने हाथ सों जपै सुमिरनी जउने लेयँ रामको नाम ६७ करै वन्दगी हम त्यहि सों ना यह फिरि कह्यो बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें बघऊदन की राजा मनै गयो शरमाय ६८ मता अनूपी नृप जम्बा की तहँ पर गई रहै तब आय ॥ शोभा लखिलखि सो योगिनकै मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ६६ औ फिरि बोली यह योगिनसों तुम्हरी योग सिद्धि है जाय ॥ चलिकै नाचो म्वरे महलन में योगेश्वरै कृष्णको ध्याय १०० सुनिकै बातें ये रानी की महलन तुरत पहुँचे जाय ॥ मलखे लीन्हे इकत्तारा को सय्यद खँझरी रहे बजाय १०१ बजै सरंगी भल देवा कै आल्हा डमरू रहे घुमाय ॥ बजै बांसुरी बघऊदन कै थिरकन लाग लँहुरवा भाय १०२ टप्पा ठुमरी भजन रेखता धुरपद बिहंगड़ो कल्यान ॥ जयजयवन्ती औ तिल्लाना तोरै ग़ज़ल पर्ज पर तान १०३ भाव बतावै सब अँगुलिन सों यहु द्यावलि को राजकुमार ॥ ता ता थे ई ता ता थे ई कबहूं निकरै शब्द अपार १०४ रानी कुशला की बाँदी तहँ देखै सबै काम बिसराय ॥ एक पहरते दुइ लग बीते तीसरपहरू गयोनगच्याय १०५ बाँदी गमनी तब महलन को देखत रानी उठी रिसाय ॥