आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ौका युद्ध । ८६ ४१. पहिलै लोहै तुम्हरी राखैं फिरिकचलोहियादेखुहमार १६४ सुनिकै बातें ये ऊदन की अनुपी भाला लीन उठाय ॥ दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय १६५ छुटिगा भाला जो हाथेते कम्मर मचा ठनाका जाय ॥ घोड़ा बेंदुला बायें दैगा औबचिगयो लहुरवाभाय १६६ हँसिकै बोल्यो तब अनुपीते यहु रणबाघु उदयसिंहराय ॥ दूधु लरिकई माँ पायो ना तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाय १६७ अब तुम सुमिरौ यहिसमयामाँ जो गाढ़े माँ होयसहाय ॥ वार हमारी ते बचिजायो घरमाँ छठी धरायौ जाय १६८ अब ना बचिहौ रणखेतनमें अनुपी सम्हरि होउ हुशियार ॥ इतना कहिकै बघऊदन ने नंगी खैंचिलीन तलवार १६६ मरी सिरोही तब अनुपी के धरती गिरयो भरहराखाय ॥ मरिगा अनुपी रणखेतन माँ टोंडरमलौ पहुँचा आय १७० औ ललकारा बघऊदन का अब तुम खबरदार ह्वैजाय ॥ धोखे अनुपी के भूल्यो ना अबहीं सरगदेउँपहुँचाय १७१ खैंचि सिरोही लइ कम्मर से औ ऊदन पर दई चलाय ॥ वार ढालपर ऊदन लीन्ह्यो टोंडर हाथ मूठि रहिजाय १७२ टूटि सिरोही गै टोंडर कै तब मनसोचभयो अधिकाय ॥ ऐँड़ लगायो फिरि बेंदुलके टोंडरपास पहुँच्यो आय १७३ ढाल कि औझड़हनिकै मारयो औ घोड़ाते दियो गिरायं ॥ बाँधिकै मुशकें फिरि टोंडर की लशकरतुरतदीनपहुँचाय १७४ मारु बन्दभै तब हुँवना पर सायंकाल पहुँचा आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७५ परे आलसी निज निज शय्या घों घों कण्ठ रहा घरांय ॥