आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ६१ ४३ अथ कथाप्रसंग ॥ गा हरकारा फिरि माड़ो को बारहदरी पहुँचा जाय ॥ बेटा जम्बै को सूरजमल तहँपर रहा रामको ध्याय १ खबरि सुनाई हरकाराने अनूपी मरण गयो सबगाय ॥ सुनिकै बातें हरकारा की मनजरिमरयो बघेलाराय २ तुरत नगड़ची को बुलवायो डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हाथी घोड़ा औ तोपन को बबुरीबन का दीन हँकाय ३ हरियल घोड़ाकी पीठी पर आपो फांदिभयो असवार ॥ माथ नायके श्रीगणेश को औ मन सुमिरयो नन्दकुमार ४ सुमिरि भवानी जगदम्बाको औ शिव रामचन्द्रको ध्याय ॥ सूरज चलिभा बबुरीबनको औ रणखेत पहुँचा आय ५ आगे लश्कर के सूरजमल गरुई हांक दीन ललकार ॥ काकी माता नाहर जायो काके जमे करेजे बार ६ को कटवावत है बबुरीबन औ को मोहबेका सरदार ॥ कौन कहावत उदयसिंह है किसने डरा अनूपी मार ७ घोड़ा बेंदुला पर टहलत रहै यहु रणबाघु लंहुरवा भाय ॥ सुनिकै बातें सूरजमल की तुरतै बोला बनाफरराय ८ हमरी माता नाहर जायो हमरे जमे करेजे बार ॥ हम कटवावत हैं बबुरीबन हमहीं डरा अनूपी मार ६ कही सुना भा जब दूनों माँ दूनों कुँवर गये अलगाय ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतनभाय १० बम्ब के गोला छूटन लागे धुँवना रहा सरग में छाय ॥ गोली ओलासम बरसत भइँ भन भन भन्न भन्न भन्नाय ११ छाय अँधरिया गै दिनही में औ तिलडरा भुईं ना जाय ॥