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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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वन्दना गोरक्षमालं गुरुशिष्यपालम्, शेषांहिमालं शशिखण्डभालम् । कालस्य कालं जितजन्मजालम्, वन्दे जटालं जगदब्जनालम् ॥ वाहनरूप गौ ( महोक्ष ) की रक्षा करनेवाले अर्थात् स्वयं भगवान् शंकर उनकी भा, महातेजोरूप विभूति, साधक भक्तों को प्रदान करनेवाले अथवा महान् योगी के रूप से विख्यात जो गोरक्ष ( गोरक्षनाथ ) हैं उनकी योगजनित महादीप्ति साधक योगियों को प्रदान करनेवाले अथवा गौ अर्थात् इन्द्रियों की उनके तत्-तत् विषय ( रूप, रस आदि ) से रक्षा करनेवाले योगिजनों को महाते- जोरूपा विभूति प्रदान करनेवाले अथवा गौओं के रक्षकों को पुण्य- प्रभा से उद्भासित करनेवाले, गुरू और शिष्य दोनों को विघ्न- बाधाओं—आधिभौतिकादि उपद्रवों—से बचानेवाले या उनका पालन करनेवाले, गुरू-शिष्य-परम्परा को निरन्तर अक्षुण्ण रखनेवाले, शेष- नाग की माला धारण करनेवाले, मस्तक पर चन्द्रलेखा धारण करने- वाले, काल के भी काल ( महाकालस्वरूप ), जन्म, जरा, मरण आदि की परम्परा पर विजय प्राप्त कर चुके अर्थात् अनादिनिधन एवं जैसे नाल ( कमलनाल ) कमल का अधार है वैसे इस जगत् के के अधारभूत जटाधारी भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ ।