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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३२ ] परिपक्व देह या सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए योग ही उपाय है। नाथयोगी हठयोग को प्रधान मानते हैं। हठयोग से राजयोग की सिद्धि होती है। हठयोग प्राणायामप्रधान है। मन्त्रयोग, लययोग और राजयोग में भी प्राणायाम और हठयोग सहायक है। प्राण अधिभूत तत्त्व है। अतः इस दृष्टि से प्राणायाम या हठयोग आधि- भौतिक साधन है। एक सफल ध्यानयोगी शरीर और स्वास्थ्य से क्षीण, दुर्बल अल्पायु और रोगी हो सकता है किंतु वह अपनी इच्छा से शरीर त्याग नहीं कर सकता। हठयोग की क्रियाओं से सिद्धदेह या परिपक्व देह की प्राप्ति होती है। मानस साधन के लिए ऐसा शरीर सर्वाधिक उपयुक्त और उचित माध्यम हो सकता है। ऐसे योगी की मृत्यु इच्छा-मृत्यु होती है। गोरक्षनाथादि ने हठयोग या उससे प्राप्त सिद्धियों को भी लक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। ६७ हठयोगप्रदीपिका में स्पष्टतः कहा गया है कि राजयोग में आरूढ़ होने के लिए हठयोगविद्या का अभ्यास करना चाहिए। ६८ इस योगाभ्यास के आरम्भ के लिए नाथाचार्यों ने संयम का विधान किया है। घेरण्डसंहिता की तरह ही स्वात्मारामरचित हठयोगप्रदीपिका में भी हठयोग का अभ्यास आरम्भ करने के पूर्व आहार, अपथ्य, पथ्य, भोजन आदि से सम्बद्ध संयमों के पालन का उपदेश किया गया है। योगाभ्यास के प्रतिबन्धकों के विवरण में अत्याहार, परिश्रम, प्रजल्पन ( या बहुभाषण ), यमग्रहण ( स्नान, रात्रि में ही भोजनग्रहण, फलाहारादि का नियम ग्रहण ) जनसंगम, चंचलता इन छः की गणना की गयी है। योगसाधकों में उत्साह, साहस, धैर्य, तत्वज्ञान, निश्चय, जगत्संगपरित्याग इन छः की गणना की गयी है। बताया गया है कि यम में मिताहार मुख्य है तथा नियम में अहिंसा । ६९ हठयोगप्रदीपिका के यमनियमसम्बन्धी श्लोक मूल श्लोकों में अन्तर्गणित नहीं हैं। वे ही श्लोक थोड़े-से अन्तर से तांत्रिक ग्रन्थ 'शारदातिलक' में मिलते हैं। ६७. नाथयोग : अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० १६ । ६८. हठयोगप्रदीपिका १.१ । ६९. हठयोगप्रदीपिका—१.५७-६३, १.१५, १६, १.३८, ४० । विस्तार के लिए द्रष्टव्य—नाथ और सन्त साहित्य , पृ० २७५-२७७ ।

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