अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वहितम् । तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षिते ॥ यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि ॥ [ऋग्वेद-६/११३/७, ११ ] हे पवित्र करनेवाले देव, मुझे उस लोक में, दिव्य भाव में स्थित कर, जहाँ सदा प्रकाश ही प्रकाश विद्यमान है, जहाँ अंधकार से प्रकाश की ओर गति नहीं होती, अपितु एक प्रकाश से पूर्णतर प्रकाश की ओर गति होती है, जहाँ दुःख से सुख की ओर गति नहीं है, अपितु एक आनंद से पूर्णतर आनंद की ओर गति होती है, जहाँ मृत्यु से अम- रत्व की ओर गति नहीं है, किन्तु सदा अमरत्व ही अमरत्व विद्यमान है, जहाँ उच्चतम लक्ष्य सदैव प्राप्त रहता है।