अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ] राजयोगः स कथितः स एव मुनिपुंगव । राजत्वात् सर्वयोगानां राजयोग इति स्मृतः ॥ ३ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ, वही राजयोग कहा गया है, क्योंकि वह सब योगों का राजा है, इसलिए राजयोग कहलाता है ॥ ३ ॥ राजानं दीप्यमानं तं परं ब्रह्माणमव्ययम् । देहिनः प्रापयेद् यस्तु राजयोगः स उच्यते ॥ ४ ॥ जो योग देहधारियों को राजा के तुल्य शोभायमान ( देदीप्यमान ) उस अव्यय परब्रह्म में पहुँचाता है, वह राजयोग कहलाता है ॥ ४ ॥ राजयोगस्य महात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानात् सिद्ध्यति मुक्तिर्हि गुरोर्ज्ञानं च लभ्यते ॥ ५ ॥ हे मुनिवर, राजयोग का वास्तविक महात्म्य कौन जान सकता है ? उसके ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है और गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ अन्तर्योगं बहिर्योगं यो जानाति विशेषतः । मया त्वयाप्यसौ वन्द्यः शेषैर्वन्द्यस्तु किं पुनः ॥ ६ ॥ जो पूर्वोक्त अन्तर्योग और बहिर्योग को विशेषरूप से ( तत्त्वतः ) जानता है वह मेरा और तुम्हारा भी वन्दनीय है, औरों का वन्दनीय है इसमें तो कहना ही क्या है ? ॥ ६ ॥ चित्तं बुद्धिरहंकार ऋत्विक् सोमश्च पंचमः । इन्द्रियाणि दश प्राणान् जुहोति ज्योतिर्मण्डले ॥ ७ ॥ चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक् और पांचवां सोम—ये दस इन्द्रियों और प्राणों का ज्योतिर्मंडल में हवन करते हैं १ ॥ ७ ॥ १. देह में पांच तत्त्व हैं—चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक्, ( कर्म करनेवाली अस्मिता, एवं सोम ( अमृत, मन ) । ये पांचों होम करने वाले हैं । दश इन्द्रियाँ होम की सामग्रियाँ हैं ( हव्य हैं ) और ज्योतिर्मण्डल होम कुण्ड है ।