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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ २७ ] तन्मूलान्नादिपर्यन्तं विभाति ज्योतिर्मएडलम् । योगिभिः सततं ध्येयमणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ॥ ८ ॥ उनके मूलभूत अन्नादि पर्यन्त ज्योतिर्मण्डल शोभित होता है। उसका योगियों को सदा ध्यान करना चाहिए। वह अणिमा आदि सिद्धियाँ देने- वाला है ॥ ८ ॥ वेदशास्त्रपुराणानि सामान्यगणिका इव । एकैव शाम्भवी विद्या गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ६ । वेद, शास्त्र और पुराण गणिका के तुल्य सर्वसाधारण हैं, सबकी उन तक पहुँच है, केवल एकमात्र शाम्भवी विद्या ही कुलवधू की तरह गुप्त है ॥६॥ अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता । एषा हि शाम्भवीमुद्रा सर्वशास्त्रेषु गोपिता ॥ १० ॥ यह शाम्भवी-मुद्रा अन्तर्लक्ष्यवाली, बहिर्दृष्टिवाली और निमेष और उन्मेष से शून्य है अर्थात् शाम्भवी मुद्रा में बहिर्दृष्टि होने पर भी अन्तर्लक्ष्य होता है और दृष्टि में निमेष और उन्मेष नहीं होते हैं। यह सब शास्त्रों में छिपाई गई है, गोपित है ॥ १० ॥ आदिशक्तिरूमाचैषा मत्तोन्मंवतीपुरा । अधुना जन्मसंस्कारात्त्वमेको लब्धवानसि ॥ ११ ! यह शाम्भवी-मुद्रा आदिशक्ति उमा रूप है, यह पहले मुझसे उत्पन्न हुई थी, इस समय जन्म संस्कार वश तुमने इसे प्राप्त किया है ॥ ११ ॥ गुह्याद् गुह्यतरा विद्या न देया यस्य कस्यचित् । एतज्ज्ञानं वसेद् यत्र स देशः पुएयभाजनम् ॥ १२ ॥ यह विद्या गुह्य से भी गुह्यतर ( अधिक गुह्य ) है । ६से किसी को नहीं देना चाहिए। यह ज्ञान जहाँ रहता है वह प्रदेश ( देह ) पुण्यदेश है, वह जन पुण्यात्मा है१ ॥ १२ ॥ १. 'देशः' के स्थान पर 'देहः' पाठ अच्छा मालूम होता है।