भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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८४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

रामहस्तान्मृतः शीघ्रं लब्धुं तां घर्षयास्यहम् । कपिर्दृष्ट्वा राघवाय निवेदयतु मत्कृतम् ॥७०॥
आगमिष्यति उल्लङ्घ्या मणौ मां निहनिष्यति । इति निश्चित्य स ययौ सीते मवेष्टितो मुदा ॥७१॥
नूपुराणां ध्वनिं श्रुत्वा सिंहलाऽऽसीद्विदेवता । रावणो जानकीमाह मा दृप्त किं विलम्बसे । ७२।
रामं वनेचरं राज्यभ्रष्टं त्यक्तगृहं जनम् । पित्रा हनं भोगहीनं यदा स्वगृहनिर्गतम् ॥७३॥
एकान्तवासिनं दिग्वस्त्रवल्कलाधारिणम् । तं त्यक्त्वा मां भजस्वाद्य त्रैलोक्येशं महाबलम् ॥७४॥
अमरौघैः सेवितं मां भवन्तं पदस्थितम् । प्रियो मन्दोदरीमुख्यास्त्वां भजिष्यन्त्यहर्निशम् ॥७५॥
मया राज्यं स्वदधीनं कृतमपि भजस्व माम् । मया स्वजीवनं वापि त्वदधीनं कृतं महत् ॥७६॥
इति नानाविधैर्वाक्यैः प्राथयामास रावणः उवाचाधोमुखी सीता निधाय तृणमन्तरे । ७७॥
राघवाद्बिभ्यता नूनं भिक्षुरूपं धृतं त्वया । रहिते राघवाभ्यां त्वं शुनीव हविराध्वरे ॥७८॥
हृतवानसि मां नीच तत्फलं प्राप्स्यसेऽचिरात् । यदा रामशराग्रविदारितवपुर्भवान् ॥
भविष्यसि रणे रामं जानीषे मानुषं तदा । ७९ ।
श्रुत्वा रक्षोधिपः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम् । वाक्यं क्रोधसमाविष्टः पुनर्वचनमब्रवीत् ॥८०॥
प्रविशो लङ्कायां त्रिदशवदनार्त्तिनिवारिणी गतोऽपि स्थाता न युधि पुरतो लक्ष्मणसहः ।
तथा यास्यन्पूर्वेष्विपदमसुनेशश्च झटिती जयः श्रीरामे स्यान्न मम बहुनाशीश्च तु भवेत् ॥८१॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । षष्ठाक्षरमपादेषु चतुर्णं चरणेष्वपि ॥८२॥
सप्तमञ्चापि चत्वारि लोप लोकामुमुं पठ । एवं तया जितो वाक्यवाग्बाणैः स दशाननः ॥८३ ।

मम अवलम्ब जानकर रावण निरन्तर मुझ से प्रेम करता ही रहता है ६९ । 'रामके हाथसे शीघ्र मरनेके लिए मैं चलकर सीताका तिरस्कार करूंगा तो मेरी दुर्दशा देखकर वह वानर रामसे कहेगा ॥ ७० ॥ सो सुनकर राम यहाँ आवेंगे और मुझे मारेंगे' ऐसा विचार करके उस त्रिकूटकी शाखा लेकर सानन्द ऊपर चल पडा ॥ ७१ ॥
नूपुरोंकी ध्वनिश्रवण कर सीताजी घबडा गयीं और उन्होंने मुख बन्द कर लिया । तब रावणने सीतासे कहा- तू मुझसे लजाती क्यों है? ॥ ७२ । वनमें भ्रमण करनेवाले, राजपद सुखजनतासे रहित, पितृहीन, मात-हीन, सदा घर निष्कासित ॥ ७३ । एकान्तवासी दिगम्बर भोग बन्कल भण्डपण्डित वृत्तक (छिन्नवेषधारी) धारण करनेवाले रामको छोडकर तू त्रिजगत्पति और महाबलवान् मुझ रावणका आश्रय ले और मुझे सेवा कर ॥ ७४ ॥ मैं अमरगणोंसे सेवित और आद्यन्तहीन होकर महान् पदपर स्थित हूँ । मेरी सेवा करनेतु मेरी मन्दोदरी आदि स्त्रिये भी रात दिन तेरी दासी बनकर रहेंगी ॥ ७५ ॥ मैने अपना राज्य तथा अपना जीवन तुझको दे दिया है । तू मेरी बनकर रहे ॥ ७६ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके वाक्यद्वारा रावण प्रार्थना करने लगा ।
तब नीचमें तिनकेका त्राट करके तथा नीच मुख किये हुए सीताने कहा-॥ ७७ ॥ अरे पापी ! बडा ढोंग हाँकता है । रामके डरसे तू भिक्षुका रूप धारण करके और श्रीरामलक्ष्मणका अनुपस्थितिम यज्ञमें जैसे कुत्ता हवि अर्थात् हव्यनया सामग्री चुराकर आदि लेकर भागे, उस प्रकार तू मुझे लेकर भग आया है। अरे नीच ! उसका फल तुझको शीघ्र मिल जायगा । जब रामके बाणसे विदारितशरीर होकर तू गिरेगा तब तुझे यह पता लग जायगा कि राम मनुष्य है या और कोई यह सुनकर राक्षसाधिप रावण कुपित होकर जानकीको कठोर वचन कहता हुआ बोला ॥ ७८-८० ॥ 'इस लङ्कामें आकर स्वर्गओकके र्भ, सुख शान्ति हो जायँगे । लक्ष्मणसहित वह राम भी मत समक्ष युद्धमें नहीं खडे रह सकेगा । यहाँ आगतो प्रधुओके सहित बहुत बडी भारी विपत्तिमे पड जागा । यहाँ उस जटाधारी रामकी जीत नही होगी और मुझे भी आनन्द न प्राप्त होगा' ॥ ८१ ॥ रावण-की इस बातको सुनकर जानकीने कहा-चारो चरणोम छठे अक्षर तथा आनेवाले चारो सप्तम अक्षरोका लोप करके तुम इसी श्लोकको फिरसे पढो । वही हल तुम लागोका होगा । कहनेका आशय यह है कि ८१वें श्लोकमेंसे चारो चरणोके प्र वि और न ये चार अक्षर निकल जानेसे यह अर्थ होगा कि लङ्कामे दशवदन रावणके ऊपर शीघ्र ही विपत्ति आ येगी अर्थात् वह झूर जायगा । लक्ष्मणके साथ राम युद्धमें मा हटेंगे ।