भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १०] सारकाण्डम् २०७

सैकतं स्थापयामास लिङ्गं रामो विधानतः। तदा संस्मार मनसि कौतुकं रघुनन्दनः ॥१२४॥ श्रावयन्ती मणिः द्यौश्च सायंकोटिशतप्रभोपमः। तं वरं च मणिं कण्ठे बबन्ध रघुनन्दनः ॥१२५॥ वस्त्रपुष्पैर्धनैर्वस्त्रैश्चामरव्येषुभिः दिव्यैः पाद्यार्घ्यं च पूजयामास तान् मुनीन्द्रान्॥१२६॥ दत्तस्वं मुनयस्तश वरंवेगातिपूरिताः। ययुः स्वीयाश्रमान् मार्गे द्राग्ददर्श स मारुतिः ॥१२७॥ पप्रच्छ मारुतिर्विप्रान् यूयं केन प्रपूरिताः। तेऽप्यूचुर्लिङ्गमाराध्य रामेणैव पूरिताः ॥१२८॥ तत्तेषां वचनं श्रुत्वा क्रोधाविष्टोऽप्यचिन्तयत् । वृथाऽहं भ्रमितस्तेन रामेणाद्य प्रतारितः ॥१२९॥ इत्थं वदन्ययौ रामं क्रोधात्स्वीये पदद्वयम् । भुवि हतात्थ पतितस्तदा भूम्यां पदद्वयम् ॥१३०॥ गतं कपिस्तदा राममब्रवीत्किं न मे स्मृतः। सीताशुद्धिर्मया लङ्कां गत्वानीतेति सोऽद्य हि ॥१३१॥ तस्य मेऽद्योपवापोऽत्र काशीं प्रेष्य त्वया कृतः । किमर्थं भ्रमितश्चाहं यदीत्थं ते हृदि स्थितम् ॥१३२॥ अमरिष्यन्मया ज्ञातं चेत्पूर्वं हृद्गतं तव। काशीमद्य हि गत्वा किमर्थं लिङ्गमानये ॥१३३॥ एकं त्वदर्थमानीतमपरं लिङ्गमुत्तमम्। मयाऽऽप्यार्यं समानीतं तदग्रे किं करोम्यहम् ॥१३४॥ एवं क्रोधयुतं वाक्यं किञ्चिद्गर्वसमन्वितम्। रामः श्रुत्वा कपिं प्राह कपे त्वं सत्यवागसि ॥१३५॥ पर्यन्तस्थापितं लिङ्गं समुत्पाट्य त्वं बलात् । स्थापयामि त्वयानीतं ह्यद्या विश्वेश्वराभिधम्॥१३६॥ तथेत्युक्त्वा मारुतिः स संवृतस्येश्वरस्य च। प्रवेष्ट्य मस्तके पुच्छं बलेनान्दोलयन्मुहुः ॥१३७॥ त्रुटितं वत्कपेः पुच्छं पपात भुवि मूर्च्छितः। असुर्वानराः सर्वे न चचालेशस्तदा ॥१३८॥ स्वस्थो भूत्वा मारुतिः स गलगर्वस्तदाऽभवत् । ननाम परया भक्त्या प्रार्थयामास तं मुहुः ॥१३९॥ मायाऽपराधितं राम तत्क्षमस्व कृपानिधे । तदाह मारुतिं रामस्त्वं मल्लिङ्गोत्तरे न्विदम् ॥१४०॥


वानरोंको बुलाकर रामने विधिवत् बालुका लिङ्गको स्थापित कर दिया। पश्चात् भगवान् रामने कौतुक मणिका स्मरण किया ॥ १२३-१२४ ॥ स्मरण करते ही करोड़ों सूर्यके समान प्रभाशाली वह मणि आकाशमार्गसे आ गया। तब रघुनन्दन रामने उस मणिको कण्ठमें बाँध लिया ॥ १२५ ॥ उस मणिसे प्राप्त धन, वस्त्र, आभरण, शंख, धनु, दिव्य बाणवान तथा पायस आदिसे रामने मुनियोंका पूजन-सत्कार किया ॥ १२६ ॥ श्रीरामसे पूजा प्राप्त करके प्रसन्न हो मुनि अपने-अपने आश्रमोंको जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें मारुतिने देख लिया ॥ १२७ ॥ तब हनुमान्ने उनसे पूछा कि आपकी पूजा किसने की है ? उन्होंने उत्तर दिया कि रामने शिवालयकी आराधना तथा स्थापना करके हम लोगोंका पूजन की है ॥ १२८ ॥ हनुमान् उनकी बात सुनते ही क्रुद्ध होकर विचारने लगे कि रामने आज मुझसे व्यर्थ इतना परिश्रम कराके ठगा है ॥ १२९ ॥ यह विचारते हुए वे क्रोधसे रामके पास गये और जातेही उन्होंने अपने दोनों पाँवोंको जमीनपर पटका। इससे उनके दोनों पांव पृथ्वीमें धंस गये। बादमें हनुमान्ने रामसे कहा कि क्या आपका मेरा स्मरण नहीं था ? जिस हनुमान्ने लङ्कामें सीताकी खोज की थी और लौटकर आपको उनकी खबर दी थी, ॥ १३० । १३१ ॥ उसी हनुमान्का आज आपने काशी भेजकर ऐसा उपहास किया ? यदि आपके मनमें यह था तो फिर मुझे इस तरह व्यर्थ क्यों सताया ? ॥ १३२ । यदि मुझे आपका अभिप्राय ज्ञात हो जाता तो मैं कभी काशी जाकर ये दो शिवलिंग न लाता ॥ १३३ ॥ इनमें से एक आपके लिए और दूसरा उत्तम शिवलिंग अपने लिये ले आया हूँ। अब मैं इस आपके शिवलिंगका क्या करूँ ! ॥ १३४ ॥ इस प्रकार कुछ क्रोध तथा गर्वयुक्त हनुमान्का वाक्य सुनकर रामने कहा कि हे कपे ! तुम्हारा कहना सत्य है । १३५॥ अब तुम यदि इस मेरे स्थापित लिङ्गको पूँछसे लपेटकर उखाड़ लो तो मैं तुम्हारे लाये हुए विश्वेश्वरलिङ्गको यहीं तुरन्त स्थापित कर दूँ। ॥ १३६॥ 'बहुत अच्छा' कहकर हनुमान्ने उस बालूके लिंगके उपरी भागमें पूँछ लपेटकर बारम्बार खूब जोरसे हिलाया ॥ १३७॥ जिससे सहसा उनकी पूँछ टूट गयी। वे जमीनपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। परन्तु बालुका लिंग तनिक भी नहीं हिला यह देखकर सब वानर हंसने लगे ॥ १३८॥ थोड़ी देरमें मारुति स्वस्थ हो गया गर्व छोड़कर भक्तिसे रामको नमस्कार करके प्रार्थना करने लगे — ॥ १३९॥