श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] बालकाण्डम् १०९
मद्रूपमोहिताः सर्वा ऋषिपत्न्यः सहस्रशः । भग्नेच्छे ताः समागन्तुमृषिभित्रासिता अपि ॥१५८॥ ततो ते मुनयः सर्वे मामज्ञात्वा मुनीश्वराः । ददुः शापं महाघोरं क्रोधसञ्चिन्नमानसाः ॥१५९॥ ऋष्यर्थे मोहिता नार्यस्त्वया तस्माद्विद्विजोत्तम । पतत्वद्य रतेरंगं लिंगं भुवि च नो गिरा ॥१६०॥ एवं द्विजैस्तदा शप्तोऽपतल्लिङ्गं तदा भुवि । द्विजशापस्य सं राम गतोऽहं गुप्ततां तदा ॥१६१॥ द्विजनायोऽप्यदृष्ट्वा मां जग्मुः स्वं स्वं गृहं प्रति । तल्लिंगं वर्धते भूयो गगनं व्याप्य संस्थितम् ॥१६२॥ तद्दृष्ट्वा चकिता देवास्तस्यान्तं द्रष्टुमुद्यताः । पश्यन्तस्तस्य नोऽप्यन्दानन्तमौण्ड्यं बेधसः ॥१६३॥ तदा मामेत्य स विधिभेदाऽङ्गं न्यवेदयत् । अकाले प्रलयस्त्वद्य शम्भोऽनेन भविष्यति ॥१६४॥ तदा मया पूर्ववृत्तं विधि संश्राव्य सादराम् । त्रिशूलो देयसो दत्तम् छेतुं सोऽब्रवीच्च माम् ॥१६५॥ कथं तैऽङ्गं दास्येऽहं त्वमेव छेत्तुमर्हसि । ततो मयार्कखण्डानि कृतानि तस्य राघव ॥१६६॥ त्रिशूलेनापि क्षिप्तानि भूमौ निर्गतानि हि । तज्जातान्यत्र लिंगानि ज्योतिर्मयानि द्वादश ॥१६७॥ ॐकारः सोमनाथश्च त्र्यम्बको मल्लिकार्जुनः । नागेशो वैद्यनाथश्च काशीविश्वेश्वरस्त्वहम् ॥१६८॥ केदारेशो महाकालो भी मेशो घुमृणेश्वरः । एवमेकादश प्रोक्ता ज्योतिर्लिङ्गमयाः शुभाः ॥१६९॥ गन्धमादननाम्नेगो मेरोरीशानदिक्स्थितः । आपोच्छिन्नः न कस्यापि मानवस्याक्षियोचरः ॥१७०॥ तदा ते मुनयः सर्वे शिवं बुद्ध्वा तु लज्जिताः । ददुश्च पुनर्लिंगं मदास्तु गिरिजाप्रिय ॥१७१॥ ततः प्रलयवातेन गन्धमादननामकम् । तन्मेरोरुत्तरे शृङ्गेप्रकम्पानापतद्भुवि ॥१७२॥ तदिदं बान्धिमद्येऽगं दानेण सागरागाम् । गन्धमादननाम्नेदं शृङ्गं पश्यात्र राघव ॥१७३॥ गन्धमादननाम्नश्च लिंगं द्वादशमं शिवम् । अस्यप्रतिष्ठितलिंगम्य हंप्राप्यामान्तिके स्थितम्॥१७४॥
... कर आनंदसे भिक्षाके लिए मुनियोंके आश्रममें विचर रहा था। इस प्रकार ऋषियोंके आश्रममें घूमता हुआ रूप देखकर संख्या ऋषिपत्नियां मन होकर मोहित हो गयीं। पतिव्रताके संस्कारपर भी न नहीं रही और घर पदपूर्वक पूछने लगीं ॥ १५६-१५८ ॥ तब वे सब मुनि और मुनि न पहिचानकर बहुत घबराय और क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझ बड़ा भयानक शाप दे दिया ॥ १५९ ॥ उन्होंने कहा—अरे अधम ब्राह्मण ! तूने रति करनेके लिए हमारे स्त्रियोंको मोहित कर लिया है, इससे तेरे रति का साधन अङ्ग अर्थात् लिङ्ग हमारे कहेनुसार कटकर समान पर गिर पड़े ॥ १६० ॥ हे राम ! उनके शापम द्विजवर्य्याश मेरा लिङ्ग कटकर तुरन्त जमीनपर गिर पड़ा। आश्रम में अन्तर्धान हो गया ॥ १६१ ॥ मुझ न देखकर ऋषियोंके स्त्रिय भी अपने-अपने घर चली गयीं । तदनन्तर वह लिङ्ग इस प्रकार बढ़ा कि आकाश तक व्याप्त हो गया ॥ १६२॥ यह देखकर ब्रह्मा बहुत चकित हुए और उसका अन्त देखनेके लिए उद्यत हो गये । बहुत कालतक देख पन्ता नान्तान्तर भी न पाया। जब मेरे लिङ्गका अन्त नहीं मिला ॥ १६३ ॥ तब उस परम अम्बर ईश्वरने तुरन्त उनसे कहा—हे शम्भो, इस ही अकालमें ही प्रलय होना चाहता है ॥ १६४ ॥ मैंने ब्रह्माको पूर्ववृत्तान्त सुना कर सादर उनके हाथमें उस लिङ्गको काटनेके लिए अपना त्रिशूल दे दिया। तब ब्रह्मा ने कहा— ॥ १६५ ॥ न ब्रह्मा आपके अङ्गको कैसे काट सकता हूँ। आप ही इसे काटें । हे राघव ! तब मैंने उस लिङ्गके बारह टुकड़े कर डाले ॥ १६६ ॥ फिर त्रिशूलसे ही उठाकर उनको भूमिपर इधर उधर फेंक दिया, वे ही बारह टुकड़े यहांपर बारह ज्योतिर्लिङ्ग नामसे प्रख्यात हुए ॥ १६७॥ ॐकारनाथ, सोमनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, मल्लिकार्जुन, नागेश, वैद्यनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, करदारेश्वर, महाकाल, और घुमृणेश्वर ये ग्यारह शुभ ज्योतिर्लिङ्ग हैं ॥ १६८ । १६९॥ बारहवां लिङ्ग गन्धमादन पर्वतके ईशान कोणवाल शिखरपर बहुत काल तक स्थित रहकर भी किसी मनुष्यका दृष्टान्त नहीं भ या ॥ १७० ॥ तब मुनियोंने शिवके रूप शिवको पहिचानकर पुनः वर दिया—हे गिरिजाप्रिय ! तुमदुष्ट फिर लिंग हो जाय ॥ १७१ ॥ तदनन्तर उस समय वह मेरुका गन्धमादन नामक उत्तरी शिखर प्रलयवायुसे उड़कर यहाँ आ गिरा ॥ १७२ ॥ हे राघव ! यह गन्धमादन शिखरको तुम यहाँ देखिया समुद्रके संगमपर नसमें देख सकते हो ॥ १७३ ॥ बारहवां गन्धमादन ...