भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

सर्गः १०] सारकाण्डम् १११


पूजयामास तल्लिङ्गमगस्त्येश्वरनामकम् । नत्वा स्तुत्वा विश्वनाथं शम्भुं रामेश्वरं तथा ॥१९२॥
दृष्ट्वा पुरातनं लिङ्गं गंधमादननामकम् । ययौ स्वीयाश्रमं तुष्टः कुंभजन्मा मुनीश्वरः ॥१९३॥
सेतौ रामेश्वरस्यैव देवि देवालये शुभे । दिश्याग्नेय्यामगस्ती शमीशान्यां गंधमादनम् ॥१९४॥
वर्तेतेऽद्यापि द्वे लिङ्गे कश्चिज्जानाति वा न वा । प्रसिद्धोऽभूच्च रामेशः स्वर्गमृत्युरसातले ॥१९५॥
ततो रामाज्ञया सेतुं नलः कर्तुं मनो दधे । किंचिद्गर्वसमाविष्टस्तज्ज्ञातं राघवेण हि ॥१९६॥
यावदेकां शिलां त्यक्त्वा नलोऽन्यां प्रक्षिपञ्जले ।
तावत्तरंगकल्लोलैः सागरस्य इतस्ततः ॥१९७॥
गच्छन्तिस्म शिलाः सर्वास्ता दृष्ट्वा खिन्नमानसः । गलगर्वस्तदा रामं नलो वृत्तं न्यवेदयत् ॥१९८॥
रामः श्रुत्वा नलं प्राह रामेति द्वेऽक्षरे मम । द्वयोः संधिसिद्ध्यर्थं पृथग्विलिखतां द्वयोः ॥१९९॥
सर्वत्रैव लिखित्वा हि दृढः संधिर्भविष्यति । तथेति रामवचनात्तथा चक्रे नलस्तदा ॥२००॥
कृतः पंचदिनैः सेतुः शतयोजनमुत्तमः । कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ॥२०१॥
द्वितीयेन तथा चाह्ना योजनानां च विंशतिः । तृतीयेन तथा चाह्ना योजनान्येकविंशतिः ॥२०२॥
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरिति श्रुतम् । पंचमेन त्रयोविंशद्योजनानां कृतं त्विति ॥२०३॥
विस्तृतो द्वादश प्रोक्तो योजनानि दृढन्वयः । एवं बबंध सेतुं स नलो वानरसत्तमः ॥२०४॥
ये मज्जंति निमज्जयंति च परान् ते प्रस्तरा दुस्तरे वार्धौ येन तरंति वानरभटान् संतारयंतेऽपि च ।
नैते ग्रावगुणा न वारिधिगुणा नो वानराणां गुणाः श्रीमद्राघवधेः प्रतापमहिमा सोऽयं समुज्जृम्भते ॥२०५॥
तेनैव जग्मुः कपयो योजनानां शतं द्रुतम् । आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यंगदं तथा ॥२०६॥
जगाम वायुवल्लङ्कासंनिधिं सेनया पुरः । असंख्याताः सुवेलाद्रिं रुरुहुः प्लवगोत्तमाः ॥२०७॥


तक स्थापित किया। मुनिने अगस्त्यके साथ रामेश्वरके अग्निकोणमें उसका स्थापना की ॥ १९१ ॥ इस प्रकार मुनिने अगस्त्येश्वर नामक लिङ्गका पूजा करके विश्वनाथ, रामेश्वर एवं गौरीश्वरकी स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर पुरातन गन्धमादन लिङ्गका दर्शन किया और प्रसन्न होकर अपने आश्रमको चले गये । १९२ ॥ १९३ ॥
हे देवि ! सेतुबंध रामेश्वरके देवालयमें ही आग्नेयकोणमें अगस्त्येश्वर तथा ईशानकोणमें गन्धमादनेश्वरका लिङ्ग अभी भी विद्यमान है। उन्हें कोई इन नामोंसे जानता है और कोई नहीं भी जानता । रामेश्वरका लिंग स्वर्ग, पाताल तथा मृत्यु इन तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया ॥ १९४ ॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे नलने कुछ गर्वयुक्त होकर पुल बाँधना आरम्भ कर दिया । रामको इस गर्वका पता लग गया ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ इसके बाद नलने जलमें एक पत्थर डालकर दूसरा ज्यों ही डाला, त्यों ही समुद्रकी तरंगित लहरियोंसे सब शिलाएं इधर-उधर फिसलने लगीं । यह दशा ही खिन्नमन हो तथा गर्व त्यागकर नल रामके पास गये और सब वृत्तान्त निवेदन किया । १९७ ॥ १९८ ॥ यह सुनकर रामने नलसे कहा कि मेरे नामके 'रा म' ये दो अक्षर पत्थरोंको एक साथ मिलानेके लिये दोनों शिलाओकी बगलमें लिख दो । १९९ ॥ ऐसा लिख देनेसे सब एक दूसरेके साथ दृढ़तासे जुड़ जायेंगे और संधि (जोड़) न टूटेगी । नलने भी 'तथास्तु' कहकर रामके कथनानुसार ही किया ॥ २०० ॥ ऐसा करनेपर पाँच दिनमें सौ योजन लम्बा, सुन्दर और दृढ़ सेतु बन गया । पहिले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस, तीसरे दिन इक्कीस, चौथे दिन बाईस और पाँचवें दिन तेईस योजन पुल बाँधा । इस प्रकार सौ योजन पूरे हो गये । २०१-२०३ ॥ उसमें भी बारह योजन एकमात्र पत्थर-का ही पक्का पुल बनाया गया । इस तरह वानरोत्तम नलने सेतु बाँधकर तैयार किया ॥ २०४ ॥ जो पत्थर स्वयं डूबते और दूसरोंको डुबाते हैं, वे ही दुस्तर समुद्रमें स्वयं तैरने तथा दूसरोंको तारने लग गये । यह गुण न पत्थरका है, न समुद्रका और न बानरोंका । परन्तु यह गुण तो केवल दशरथतनय रामका ही है । जिनकी महिमा सर्वत्र व्याप्त हो रही है ॥ २०५ ॥ उस पुलके द्वारा वानरगण सौ योजन सागर शीघ्र ही पार कर गये । राम हनुमान्के कंधे तथा लक्ष्मण अङ्गदके कंधेपर चढ़कर वायुवेगसे सेनाके साथ लंकाके पास

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