श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] सारकाण्डम् १९५
अङ्गदं दक्षिणद्वारं वायुपुत्रं तु पश्चिमम् । नलं सैन्येन प्राग्द्वारं सुषेणं ह्युत्तमोत्तरम् ॥२५८॥ ययुस्ते राघवं नत्वा लङ्कां स्वस्वबलैर्युताः । तां लङ्कां रुधुः सर्व चतुर्द्वारेषु वानराः ॥२५९॥ दशास्योऽपि गृहं गत्वा सुग्रीवजर्जरीकृतः । तस्थौ तूष्णीं स रहसि स्मरन्मुद्गरतीव्रपीडनम् ॥२६०॥ माली सुमाली च तथा माल्यवान्यान्यबान्धवाः । आजग्मू राक्षसास्तस्य ते समन्तात् परस्परम् ॥२६१॥ दशाननं बोधयितुं तेभ्यस्त्वेको ययौ जराम् । माल्यवानिति नाम्ना यो बुद्धिमान्स्नेहसंयुतः ॥२६२॥ प्राह तं राक्षसं धीरं प्रशान्तेनान्तरात्मना । शृणु राजन् वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ॥२६३॥ यदा प्रविष्टा नगरीं जानकी रामवल्लभा । तदादि पुर्यां दृश्यन्ते निमित्तानि दशानन । २६४॥ घोराणि नाशहेतूनि तानि मे वदतः शृणु । खराः स्वनितनिर्घोषा मेघाः प्रतिभयंकराः ॥२६५॥ शोणितान्यभिवर्षन्ति लङ्कामुष्णेन सर्वदा । सीदन्ति देवमूर्तीनि स्विद्यन्ति प्रचलन्ति च ॥२६६॥ कालिका पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्तेऽग्रतः स्थिताः । खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलैः सह ॥२६७॥ मार्जारेण तु युध्यन्ते पन्नगा गरुडेन च । करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥२६८॥ कालो गृहाणि सर्वेषां काले काले त्ववेक्षते । एतान्यन्यानि दृष्टानि निमित्तान्युद्भवन्ति च ॥२६९॥ अतः कुलस्य रक्षार्थं शान्तिं कुरु दशानन । सीतां सत्कृत्य सधनां रामायाशु प्रयच्छ भोः ॥२७०॥ मातामहवचश्चैवं श्रुत्वा वै रावणोऽब्रवीत् । रामेण प्रेषितो नूनं प्राप्तसे त्वमनर्गलम् ॥२७१॥ गच्छ वृद्धोऽसि वन्धुस्त्वं सोढं सर्वं त्वयोदितम् । इतो वा कर्णपदवीं ददन्चेतद्वचस्तव ॥२७२॥ इत्युक्तः स रावणेन माल्यवान्स्वं गृहं ययौ । रावणोपि सभां गत्वा चोदयामास राक्षसान् । २७३॥ पूर्वद्वारे तु धूम्नाक्षं वज्रदंष्ट्रं तु पश्चिमम् । नरांतकं दक्षिणं तमुत्तरं च महोदरम् ॥२७४॥
कहा ॥ २५७॥ अङ्गदको दक्षिणी दरवाजा, वायुपुत्र हनुमानको पश्चिम द्वारपर, नलको सेनाके साथ पूर्वद्वारपर और सुषेणको उत्तरी दरवाजापर जानेका कहा ॥ २५८ ॥ वे सब रामको नमस्कार करके अपनी-अपनी सेना लेकर गये और लङ्काके चारों दरवाजाका रोककर खड़े हुए ॥ २५९ ॥ उधर रावण भी सुग्रीवके हाथसे मार खाकर घायल हो घर जाकर एकान्तमें मन मारके बैठ गया और सुग्रीवके मुक्का थप्पड़ का स्मरण करने लगा ॥ २६० ॥ तब रावणके नाना माली, सुमाली तथा माल्यवान् इन तीनों भाइयोंने आरम्भ गप की और रावणको समझानेके लिए इन तीनोंमेंसे वृद्धमन्त्र तथा इसके भाग्यवान् उसके पास गया ॥ २६१ ॥ ॥ २६२ ॥ वह शान्तिपूर्वक बार राक्षसमेश्वर रावणको समझाते हुए कहने लगा - हे राजन् ! मेरी बात सुन ले, फिर जैसी आपकी इच्छा हो वैसा करिएगा । २६३ ॥ हे दशानन ! जबसे रामकी प्यारी सीता लङ्कामें आयी है, तबसे यहाँ बराबर अपशकुन ही देखनेमें आते हैं ॥ २६४ ॥ वे सब भयानक और नाशके निमित्त हैं। उनको मैं कहता हूँ, आप सुन । मेघ तीव्र गर्जनके शब्द करते हुए लङ्कामें गरम खूनको सतत वर्षा करते हैं। शिवलिंग भिन्न स्तम्भन आते हैं। वे कभी पसीजते हैं और कभी काँपने लगते हैं । २६५ ॥ २६६ ॥ भाग खड़ी कालीकी मूर्तिएं पीले-पीले दाँत निकालकर हँसती हैं। गायोंके पेटसे गधे पैदा होते हैं। चूहे न्यालों तथा बिल्लियोंसे लड़ते हैं, साँप गरुड़के साथ युद्ध करते हैं कभी-कभी कराल काल सिर मुड़ाए काल-पीले पुरुषका रूप धारण करके लोगोंको पकड़ता हुआ दीखता है इनके अतिरिक्त और भी अनेक अपशकुन प्रकट होते दीखते हैं । २६७-२६९ ॥ इसलिए हे दशानन ! कुलकी रक्षाके लिये शान्ति धारण करो और सीताका आदर सत्कार करके प्रचुर धनके सहित शीघ्र रामको सौंप आओ ॥२७०॥ यह सुनकर रावणने अपने नानासे कहा कि अवश्य तुम रामके द्वारा यहाँ इस प्रकार अनर्गल (उलटांग) बातें करनेके लिये भेजे गये हो अस्तु, जो हुआ सो हुआ । अब तुम यहाँसे निकल जाओ । वृद्ध तथा सगे नाना होनेके नाते इतनी बातें मैंने सह लीं । तुम्हारी बातें हमारे कानोंको जलाये दे रही हैं ॥ २७१ ॥ २७२ ॥ रावणके ऐसा कहनेपर माल्यवान् अपने घर चला गया । रावणने भी सभामें जाकर राक्षसोंको आज्ञा दी ॥ २७३ ॥ तदनन्तर लंकाके पूर्वद्वारपर धूम्राक्षको, पश्चिमी द्वारपर वज्रदंष्ट्रको, दक्षिणी द्वारपर नरांतकको और उत्तरी