भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५१

श्रीशिव उवाच स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुंभसंभवः । स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ गुप्तविग्रहः ॥१९२॥ विन्ध्याचलं निजं रूपं स मुनिर्नैव दर्शयन् । पुनरुत्थास्यति गिरिर्श्वेति मन्वा तु तद्भयात् ॥१९३॥ रामस्तु सीतया सार्द्धं भ्रातृभिः सह मंत्रिभिः । संसारीव रमानाथो रममाणोऽभवद्गृहे ॥१९४॥ अनासक्तोऽपि विषयान् बुभुजे प्रियया सह । हनुमत्प्रभृतैः सद्भिवानरैः परिसेवितः ॥१९५॥ राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ । वसुधा सस्यसंपन्ना फलवंतश्च भूरुहाः ॥१९६॥ जनाः स्वधर्मनिरताः पतिभक्तिपराः स्त्रियः । नापश्यन्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥१९७॥ समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह । वानरैर्भ्रातृभि सार्द्धं संचचारार्ववनि प्रभुः ॥१९८॥ अमानुषाणि कर्माणि चकार बहुशो भुवि । लोकानामुपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥१९९॥ कोटिशः शिवलिंगानि स्थापयामास सर्वतः । अश्वमेधादिविविधान् यज्ञान् विपुलदक्षिणान् ॥२००॥ चकार परमानन्दो मानुषं वपुरास्थितः । सीतां नो रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२०१॥ शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् । कथाः संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाः ॥२०२॥ एकादशसहस्राणि सैकदशशतानि च । त्रेतायुगभवान्येव वर्षाणि रघुनन्दनः ॥२०३॥ चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । कलेर्मनेन ह्येतानि शताण्येकादशैव हि ॥२०४॥ सैकदशप्लवान्तञ्च रामो राज्यं चकार सः । एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ॥२०५॥ यस्यैकमेव तच्चासीत् पत्नीवाक्यं शरस्तथा । गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षितुं नरान् ॥२०६॥ सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च । भर्तुर्मनोज्ञा साध्वी चाप्याज्ञां ता दिवा निशाम् ॥२०७॥

सुनते हैं। हे ईश ! सब लोगोंसे पूजित होकर आप बड़ी ही शोभाको प्राप्त हो रहे हैं ॥ १९१ ॥ श्रीशिवजी बोले- इस प्रकार रामकी स्तुतिकर तथा उनसे पूजा-सत्कार प्राप्त करके गुप्तविग्रह अगस्त्य मुनि, सब मुनियोंको साथ लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ १९२ ॥ जाते समय मुनिने अपना रूप विन्ध्याचलको इस डरसे नहीं दिखलाया कि वह कही फिर उठकर न खड़ा हो जाय ॥ १९३ ॥ उधर रामचन्द्रजी सीता, मन्त्रिगण तथा भ्राताओंके साथ संसारी जीवोंके समान क्रीडा करते हुए अपने घरमें रहने लगे ॥ १९४ ॥ आसक्त न होते हुए भी अपनी प्रिया सीताके साथ ऐहिक विषयोंका आनन्द लेते रहे। हनुमान् आदि अच्छे वानर श्रीहरिकी सेवामें लग गये ॥ १९५ ॥ रमापति तथा लोकनाथ रामके शासनकालमें धरा धन-धान्यपूर्ण हो गयी, वृक्ष खूब फलने लगे ॥ १९६ ॥ मानवगण अपने-अपने धर्मपथपर चलने लगे और स्त्रियें पतिभक्तिपरायणा होकर रहने लगीं। रामके राज्यमें माता-पिताके जीते जी कहींपर पुत्रमरण नहीं होता था ॥ १९७ ॥ वे प्रभु राम-सीता, लक्ष्मण आदि भाइयों तथा वानरोंके साथ विमानपर सवार होकर अवनीतत्तलपर विचरते थे ॥ १९८ ॥ पृथ्वीपर उन्होंने अनेक लोकोत्तर कार्य किये। परमात्मा रामने लोगोंको उपदेश देनेके लिए सर्वत्र करोड़ों शिव-लिङ्ग स्थापित किये। परमानन्दस्वरूप परमेश्वर रामने मनुष्यका रूप धारण करके बहुतेरी दक्षिणावाले विविध अश्वमेध यज्ञ किये। मनुष्योंको दुर्लभ अनेक भोगसाधनोंसे रामने सीताको सन्तुष्ट किया ॥१९९॥२००॥२०१॥ परम धर्मज्ञ रामने न्यायपूर्वक राज्यका शासन करके लोगोंके पापोंको दूर करनेवाली अनेक कथाएँ स्थापित कीं ॥ २०२ ॥ त्रेतायुगके ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त लोगों द्वारा वन्दनीय चरणकमलवाले रघुनन्दनने धर्मपूर्वक राज्य किया। कलियुगके हिसाबसे रामने यहाँ ग्यारह लाख ग्यारह वर्षतक राज्य किया। राजर्षि राम सर्वदा पवित्र रहकर एकपत्नीव्रतमें स्थिर रहे ॥ २०३-२०५ ॥ जिनके लिए पत्नीका वाक्य और बाण एक समान था। उन्होंने समस्त गृहस्थाश्रमका कार्य एकमात्र लोगोंको शिक्षा देनेके लिए किया था