श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६५
इदं काव्यं राघवस्य चारित्रं पावनं शुभम् । सुरासुरा मनुष्यान्ताः प्रोचुः काव्यं हि भूतलात् ॥७॥
नेतुं रसातलं स्वर्गे न दास्यामो वयं क्वचित् । काव्यार्थमिति ते चक्रुः कलहं रोमहर्षणम् ॥८॥
ततो देवि जनान् मर्त्यान्निवार्य वचनैर्हितैः । गत्वाऽहं तंस्तु क्षीराब्धौ शेषपर्यङ्कधायिनम् ॥९॥
विष्णुं स्तुत्वा तु वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नानाविधैरपि । नानापूजोपहारैश्च पूजयित्वा सविस्तरम् ॥१०॥
कृतवान् गंतवाद्यादि तेन विष्णुर्बुबुध्यत । पप्रच्छ मां तदा विष्णुः किमर्थं वै त्विनोऽस्म्यहम् ? ॥११॥
वृत्तं सर्वं मया देवि कथितं वृत्तविस्तरम् । काव्यार्थं कलहं श्रुत्वा प्रहस्य जगदीश्वरः । १२॥
त्रिधा विभज्य काव्यं तद् रूपवान् भक्तवत्सलः । त्रयस्त्रिंशत्कोटिसमुद्रेभ्याणि पृथक् पृथक् ॥१३॥
शतानि त्रीणि श्लोकांश्च त्रयस्त्रिंशत्तथापरान् । दशाक्षरमितान्मन्त्रानप्यभजत उमापतिः ॥१४॥
द्वयक्षरे याचमानाय मयं देवे ददौ हरिः । उपदिशाम्यहं काश्यां तेऽन्तकाले नृणां श्रुतौ ॥१५॥
रामेति तारकं मन्त्रं तमेव विद्धि पार्वति । लक्ष्मीगरुडशेषेभ्यो याचमानेभ्य आदरान् ॥१६॥
मन्त्रत्रयं पृथक् विष्णुर्ददौ तेभ्योऽतिहर्षितः । शेषान् निनाय पातालं लक्ष्मीर्वैकुण्ठमादरात् ॥१७॥
पृथिव्यामथ गरुडस्तं दधार महामनुम् । शपुः शेषान्नन्नगाद्याः सर्वे पातालशामिनः ॥१८॥
स्वर्गे प्रापुर्महालक्ष्म्यास्तन् मनुं निजराडयः । काश्यपान्प्रापुर्मटायन्मन्त्रं सर्वे भूतल्वामिनः ॥१९॥
मन्त्रशास्त्रात्तत्स्वरूपं ज्ञयं गुप्त शास्त्रोक्तैः । ततः पूर्वोक्तभागान् ददौ विष्णुः पृथक् पृथक् ॥२०॥
एवं विभागं देवेभ्यो द्वितीयं पाण्डवाः । मुनीश्वरेभ्यो नागेभ्यस्तृतीयं बम्मूनामम् ॥२१॥
ततो देवा निज भागं स्वर्गे निन्युर्मुदान्विताः । पाताले पन्नगाद्याश्च निन्युर्भागं मुदा न्वितम् ॥२२॥
लोग हम रसातलम न जाय । ४-६ । क्योकि इस पावन पवित्र तथा सुन्दर रामचरित्र कवित्त है, सब राजा प्रजा और ऋषि मुनीव कहा कि हम उस काव्यका मूलभाग न तो स्वर्गमे ले जाने देंगे और नहीं पातालम । इस प्रकार व पदरकाव्यके लिए परस्पर गमर्हषक जागृत रूप रहे ॥ ७॥८॥ हे देवि ! पश्चात् मैन उन सबको समझा बुझाकर सन्तुष्ट करनेसे रोका और उन सबका भाव लेकर मैं क्षीर-समुद्रमे शेषशय्यापर शयन करनवाले विष्णुभगवान्के पास गया और नाना प्रकारका पूत्रेश्री वन्दश्रीश विस्तारपूर्वक पूजा करके अनेक वेदसवाते उत्तम स्तुति की ॥ ९ ॥ १० ॥ तदनन्तर उनके सामने वात्र बजाना गाना प्रारम्भ किया । उससे विष्णु भगवान् जाग और कहन लगे कि तुमने मुझको क्यों जगाया ? ॥ ११ ॥ देवि ! तब मैने सब हाल साफ साफ कह सुनाया । जगदीश्वर विष्णुभगवान् रामायण पञ्चकाव्यक लिए होने वाले कलहको सुनकर हँस पड़े ॥ १२ ॥ उस भक्तवत्सल भगवान्ने क्षणभरम उस काव्यक तीन भाग कर दिये । उनमसे प्रत्येक भाग तेतीस करोड तेतीस लक्ष, तेतीस हजार तान सौ तैतीस श्लोकोंका बना । उन रघुपतिने इस दश अक्षरोवाल मंत्रका का विभाजन किया ॥ १३ ॥ १४ ॥ बाकी दो अक्षर श्रीहरिने दृह अक्षरोको याचना करनवाले मुझ (शिव) को र दिया । मैं काशमे रहता हुआ अंतकालमे उन्हों दो अक्षरोका मनुष्यके कानम उपदेश करता हूँ ॥ १५ ॥ हे पार्वती ! उन दो अक्षरोको ही तुम 'राम' नामका तारक-मंत्र समझो । अर्थात् वही दो अक्षरा 'राम' यह तारक मंत्र है । पश्चात् बड़े आदरसे मांगने-पर विष्णु भगवान् अतिशय प्रसन्न होकर लक्ष्मी, गरुड और शेषन नका भी अलग-अलग तीन मन्त्र प्रदान किये । शेष भगवान् अपने मंत्रका पातलम् लए। वैकुण्ठमे और गरुड उस महामन्त्रको बड़ी यत्नसे पृथ्वीपर ले गये ॥ १६ ॥ १७ ॥ शेषके द्वारा पातालम गया हुआ यह पातालवासी नागोंको प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥ स्वर्गमें लक्ष्मीके द्वारा यह मंत्र सब दवताओंका मिला और भूतलवामी लोगोको यह मंत्र गरुडसे प्राप्त हुआ ॥ १९ ॥ हे शरीन्द्रज ! उस मंत्रोंका गुप्तस्वरूप मंत्रशास्त्रोंस जाना जा सकता है । तदनन्तर रामायणके किये हुए तीनों भागोंको विष्णुने अलग-अलग बाँट दिया ॥ २० ॥ उनमेम तैंतीस करोड तैंतीस लाख तैंतीस हजार तान सौ तेतीस ३३३३३३३३३ मत्रोंका एक भाग उन्होंने देवताओंको दिया । ३३३ ३३३३३३ का दूसरा भाग मुनीश्वरोका पृथ्वीलोकक लिए दिया और ३३३३३३३३३ का तीसरा भाग नागोंको दिया । २१ ॥