भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६७


क्षीरायुधो व्यरचिनास्तेषां योग्यानि ... । श्रीकृष्णोऽपि पुनर्व्यासो व्यासरूपी भुवि ३९ मानवानां हितार्थाय काव्याद्रामकथान्वितम् । भागद्वयसमाश्रित्य विविधानि हि ४० पृथक् पृथक् सप्तदश पुराणानि करिष्यति । भारतं विनिहत्य च महत्कृत्यं करिष्यति ॥४१। भागोद्भारस्तयोर्नन्तैर्नान्त्याहं विशुद्ध च । मद्भागोऽन्यतरोऽर्थेश्च यदा शान्तिं न गच्छति , ४२ सरस्वत्यास्तटे व्यासो व्यग्रचित्तो भविष्यति । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा नारदाय महात्मने ।४३ चतुःश्लोकींविष्णुपदेशरूपोपदेशं करिष्यति । लब्ध्वा तान्न नारदश्चापि गरीणां रणयन्मुहुः ॥४४॥ कीर्तयन् सुस्वरं गत्वा मूर्ति म- दर्शयन्निव । तच्छ्लोकान् व्यासमुनये गत्वा ह्युपदेक्ष्यति ।४५ लब्ध्वा व्यासमुनिः श्लोकांस्तान्प्रशणार्थांन्नाम्। शान्तिं लब्ध्वा मनस्तेषां विस्तारं च करिष्यति । तेषामेवार्थमादाय पुराणं परमद्भुतम् अष्टादशसहस्रं हि श्रीमद्भागवताभिधम् ४७। करिष्यत्यष्टादशमं रम्यं जनमनोहरम् । भागवत्यन्त एव वाणी भिन्ना भविष्यति ' ४८॥ पुराणानां च सर्वेषां वाल्मीकीयैव गौः प्रिये , पृथक्तां स्मृतो व्यासः श्रीमद्रामायणे शतम् । ४९ करिष्यति तथान्यानि स व्यासो विविधानि च उपपुराणान्युपपुराणानि मारं मारं विशुह्य च ॥५० भागोद्भासतखण्डान्नर्गताद्रामायणाद्भुवि । करिष्यंति नद्यःन्येऽपि षट्पञ्चाशणि मुनीश्वराः । ५१॥ तस्माद्रामायणादेव मातृमुद्धृत्य सादरान् । यत्किञ्चिदिहिनिर्भूम्यां कीर्त्यते वै कथानकम् ॥५२॥ रामायणांशजं विद्धि श्लोकपद्यमयीह यत् ।

पार्वत्युवाच

शंभो ते द्रष्टुमिच्छामि तन्मुखं नारदो मुनिः । ५३ । सर्व ज्ञात्वा विधिमुखाद्रम्यपातकनाशनम् । तन् गवतचतुश्लोकांश्चतुश्लोपदेक्ष्यति ५४॥ यैः करिष्यति स व्यासो मुनिर्भागवतं वरम् । तान्श्लोकांश्चतुर्गन्ध मां कृपया वक्तुमर्हसि ।५५।।


योग्य बनायेगा । हे देवि ! इसके अतिरिक्त स्वयं श्रीकृष्ण भी पृथिवीपर व्यासका रूप धरकर अवतार लेंगे और मनुष्योंके कल्याणके लिए भारतवर्षके भाग्यवान् रामायण कथासे विविध प्रकारके पृथक् पृथक् सत्रह पुराण रचेंगे। वे सर्वोत्तम तथा बड़ा भारी महाभारत नामक सुन्दर इतिहास भी लिखेंगे ॥ ३७-४१ । जो भारतवर्षीय रामायणके भागका सारांश होगा। उन भारत आदि ग्रंथोंका निर्माण करनेपर भी जब व्यासजीको सन्तोष न होगा, तब वे व्यग्र होकर सरस्वती नदीके किनारे बैठेंगे उसी अवसरपर ब्रह्माजी भी विष्णुप्रदत्त चार श्लोकोंका नारदको उपदेश करेंगे नारदजी उन श्लोकोंको प्राप्त करके अपनी सुन्दर वीणाको बारम्बार बजाते तथा सुन्दर स्वरसे गाते हुए सत्यवतीके पुत्र व्यास मुनिके पास जाकर उनको उन श्लोकोंका उपदेश देंगे ॥ ४२-४५॥ व्यास मुनि उस रामायणके चार श्लोकोंको प्राप्त करके बड़े शान्त चित्तसे उनका विस्तार करेंगे। उनके अर्थका आश्रय लेकर परम उदार अर्थवाले, अठारह हजार श्लोकात्मक, रमणीय और मनुष्योंके मनको मोह लेनेवाले अठारहवें 'श्रीमद्भागवत' नामक महापुराणका निर्माण करेंगे। इसलिए भागवतकी भाषा भी भिन्न प्रकारकी होगी अर्थात् अन्यान्य पुराणोंमें उनका लेख विलक्षण होगा ॥ ४६ ॥ ४७ । हे प्रिये ! सब पुराणोंकी भाषा वाल्मीकीयके समान ही है, तथापि शतरामायणके कर्त्ता व्यास अलग ही गिने जायेंगे। वेदव्यास मुनिभ भारतवर्षीय रामायणक भाषाका सार ग्रहण करके और भी बहुतसे मनोहर उपपुराण बनायेंगे इसी प्रकार उस रामायणका सारभाग लेकर अन्यअन्य मुनीश्वर छ. जाम्बाका निर्माण करेंगे। हे गिरजे ! पृथ्वीमण्डलपर और भी जो कुछ श्लोकात्मक तथा पद्यात्मक कथा मिले तो उसे भी तुम रामायणके अंशसे ही उत्पन्न समझो। पार्वतीजी बोलीं-- हे शंभो ! मैं आपके मुखारविन्दसे रामचरित्रके उन चार श्लोकोंको सुनना चाहती हूँ, जिन पापनाशक श्लोकोंको नारदने ब्रह्माके मुखसे सुनकर व्यासको सुनाया था ॥ ४८-५४ । जिनके आधारपर व्यासमुनि अपूर्व भागवत ग्रंथको रचेंगे, उन चार श्लोकोंको कृपा करके