श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७७
चामरं वीजयामास विजयः पार्श्वमस्थितः । अन्यस्तु बालव्यजनं वीजयामास पृष्ठतः ॥३८॥ कस्तूरैः क्षतसारैश्चैर्मुक्ताहारैस्तु शोभितम् । रत्नदण्डं सुविस्तीर्णं छत्रमन्यो दधार तम् ॥३९॥ हस्त्युद्वहं गजमारुह्य लक्ष्मणः शीघ्रमाययौ । सीताद्यास्ताः समाजग्मुः सौमित्रिगजपृष्ठतः ॥४०॥ पश्यन्त्यः कौतुकान्येव जलन्ध्रैः समंततः । पुष्पकं चापि गगनमार्गेणैव शनैः शनैः ॥४१॥ अमात्य संस्थितास्तत्र पुरनार्यो रघूत्तमम् । पश्यन्त्योऽथ कौतुकानि दवदुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४२॥ ततस्ते तुरगारूढा गजारूढा रथे स्थिताः । नेमिरेस्योपमाः सर्वे स्थितान्ते रामपार्श्वयोः ॥४३॥ बाहुः प्रणामान् श्रीरामं संस्थिता हारवत्तवत् । रामोऽपि कंडहस्ताभ्यां प्रणामानन्ववन्दयत् ॥४४॥ एवं गच्छति राजेन्द्रे राघवेन्द्रे शनैः पथि । गजोपरि सर्वाणास्ते नटा गाने प्रचक्रिरे ॥४५॥ एवं पश्यन् स रामोऽपि पुष्पागमदिकौतुकम् । दृष्ट्व चित्राणि वेश्यानां नृत्यानि विविधानि च॥४६॥ सुस्वराण्यथ वाद्यानि शृण्वन् मार्गे शनैः शनैः । वेष्टितश्चतुरंगिण्या सेनया स समंततः ॥४७॥ प्राप सेनानिवासाय कल्पितां शयनूत्तमाम् । अयोध्यामिव तां दृष्ट्वाऽवतरद्राघवो गजात् ॥४८॥ अभिनंद्य प्रणामंश्च पुनर्वारकृतान् मुहुः । लक्ष्मणस्य करं धृत्वा स्वकक्षां समापविः ॥४९॥ स्त्यनेहं संप्रविश्य तस्यां सिंहासनने पुनः । सीताह्यास्ताः स्त्रियः सर्वा विविशुश्चस्वगणानि ।५०।। ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । सांतायाः क्रोशमात्रेऽथ ह्यनृतान् पृथक्पृथक् ॥५१॥ एकैकस्यां दिशि त्वं मे वचनात्स्थापयस्व भोः । योजनोपरि सौमित्रि त्वंहादेतु समंततः ।५२।। नियोजयस्व शतशो वाजिवाहान् समाज्ञया । तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि तथा सर्वं चकार सः ॥५३॥ स्तो विप्रैः सुहृद्भिश्च विविधाम्नर्मनोरथैः । घृतेन श्राद्धदानेन भोजनं राघवो व्यधात् ॥५४॥
और खड़ा होकर विजय रत्नजड़ित दण्डवाला तथा मयूरपंखसे निर्मित चमर लेकर रामके आगे स्थान ... पीछेकी ओर दूसरा जयनामक सेवक पखा करने लगा ॥ ३८ ॥ तीसरा सेवक मरुजंकक्षसे सुलिखित, हजारों मुक्तागम्जाओंसे मण्डित तथा रत्नजड़ित डण्डेवाला सुविशाल छत्र तानकर खड़ा हो गया ॥ ३९ ॥ उनके पीछे हाथीपर सवार होकर लक्ष्मण शीघ्रतासे चल दिये। लक्ष्मणके हाथीके पीछे सीता आदि स्त्रियें जालिदोंमेंसे सारी ओरके दृश्योंको देखती हुई चलीं। पुष्पकविमान भी धीरे-धीरे आकाशमार्गमे उड़ता हुआ चला ॥ ४० ॥ ४१ ॥ उसपर बैठी नगरनिवासिनी स्त्रियें कौतुक देखती हुई रामचन्द्रजीके ऊपर आनन्दसे पुष्पवृष्टि करने लगी ॥ ४२ ॥ तदनन्तर घुड़सवार, गजसवार और रथसवार सैनिक रामके दोनो ओर पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ हारकी तरह कतारबद्ध खरे उन सैनिकोंने रामको प्रणाम किया। रामने भी अपने करकमलोंसे उनके प्रणामोंको स्वीकार किया । ४४ ॥ जब इस प्रकार श्रीराम राजेन्द्रपर सवार होकर धीरे धीरे चले, तब दूसरे गजोंपर बैठे हुए गायकगण अपनी-अपनी वीणा लेकर मधुर गान करने लगे ॥ ४५ ॥ रामचन्द्रजी रास्तेमें फुल्लाके महावन बागोंका दृश्य, अनेक तरहके बाजारोंका अवलोकन करते, वेश्याओंके विविध नृत्योंके देखने, मनको हरण करनेवाले बाजोंको सुनते, सम्बन्ध्य कौतुकोंको निहारते तथा चारों ओर चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए धीरे धीरे सेनानिवासके लिए कल्पित उत्तम शिविरमें आ पहुँचा। उस स्थानको दूसरी अयोध्याके समान सुरक्षित देखकर राम हाथीसे उतर पड़े। ४६-४८॥ उस समय स्त्री संनिवाके द्वारा बारम्बार किये हुए प्रणामोंको स्वीकार करके अपने हाथमे लक्ष्मणका हाथ पकड़कर रमापति राम तम्बूमें गये और वहाँ सिंहासनपर विराजमान हो गये। सीता आदि स्त्रियें भी अपनी-अपनी सवारियोसे उतरकर तम्बुओंमें जा विराजीं ॥ ४९ ॥ ५० ॥ पश्चात् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा कि तुम मेरे आज्ञानुसार सीमाकी सब दिशाओंमें एक-एक कोसकी दूरीपर सैकड़ों सिपाही अलग अलग खड़े कर दो और बाकी दिशाओमे एक-एक योजनकी दूरीपर सैकड़ों घुड़सवार नियुक्त कर दो। "जो आज्ञा" कहकर लक्ष्मणने सब वैसा ही प्रबन्ध कर दिया ॥ ५१-५३ ॥ पश्चात् ब्राह्मणों