भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

आनन्द्यो मम रामोऽत्र शर्वाणीव पृथूनथ । सीमाचारान् कुरुष्व त्वं शासनं यन्मयोच्यते ॥ १४॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । यः कश्चिद्वा समायाति पथिकः स ममाज्ञया ॥१५॥ मया संपूजितो नैव गन्तु देयः समन्ततः । मयाऽदृष्टो गतः कश्चिन्दण्ड्यो वः शासनं मम ॥१६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा चक्रे स लक्ष्मणः । च्यवनो मुनिवर्यस्तु ज्ञात्वा रामं समागतम् ॥१७॥ दर्शनार्थं ययौ शीघ्रं रामेणापि प्रपूजितः । स्थिरमासन वश्येहे राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥१८॥ राम गर्जावपत्राक्ष गङ्गाया दक्षिणे तटे । आश्रम कीकटे देशे ममास्ति परमः शुभः ॥१९॥ कंदमूलफलार्थे हि विघ्नं कुर्वन्ति मागधाः । ममाश्रमे गजांस्तेभ्यो रक्षां विधीयताम् ॥२०॥ च्यवनस्य वचः श्रुत्वा टणत्कृत्य महद्धनुः । बाणं मुक्त्वाऽऽश्रमन्तस्य परितः परिखोपमाम्॥२१॥ चकार रेखां बाणेन दुर्लङ्घ्यां च दुरासदाम् । रामबाणकृता रेखा यत्र तत्र पुरी शुभा ॥२२॥ रामरेखेति नाम्नाऽऽसीत्तथा चैव महा नदी । च्यवनश्च ततो हृष्टो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥२३॥ निंद्यः स कीकटी देशो वर्तते रघुनंदन तव वाक्याद्भविष्यंति तत्र पुण्यस्थलानि हि । २४॥ नहि त्वयाऽद्य वक्तव्यं वचनं मे सुखप्रदम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवं रामस्तमब्रवीत् ॥२५॥ कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या तु पुनपुना । आश्रमस्ते महापुण्यः पुण्यं राजनन् पदम् ॥२६॥ भविष्यति न सन्देहो मम वाक्यान्मुनीश्वर । च्यवनस्तेन सन्तुष्टो राम दृष्ट्वाऽऽश्रमं ययौ । २७॥ तस्मिन्नन्तरे तस्य सत्रे रामेण निर्मिते । प्रत्यहं कोटिश्रो विप्रा भुञ्जन्ति यतिभिः सह ॥२८॥ कुम्भोदरो मुनिः प्राप्तःसीमाचारान्तिकं तदा । गङ्गायात्राप्रसंगेन गयां गन्तु समुद्यतः ॥२९॥ समागतः प्रयागाच्च दूतान्दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः । हे दूता उत्तरं देयं यूयं कस्याज्ञया स्थिताः ॥३०॥

रथ ऊंट दानमें दिये ॥ १३ । उनका भोजन कराकर बाद भाई-बन्धुओं तथा अन्यान्य लोगोंके साथ सीता तथा स्वयं रामने भी भोजन किया । तत्पश्चात् सिंहासनापर बैठकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा- ॥ १४ ॥ हे रघूत्तम ! मैं इस जगह दो दिन तक निवास करूंगा । इसलिए मेरे कहनेसे तुम सीमापर सब दूतांका आज्ञा दो कि कोई भी यात्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी बिना मेरी पूजा ग्रहण किये न जाने पाय । यदि कोई चला गया और मुझे ज्ञात हुआ तो मैं दूतोंको दण्ड दूँगा ॥ १५-१६ ॥ रामके वचन सुनकर लक्ष्मणने वैसी ही आज्ञा दे दी । उधर च्यवन मुनिने जब सुना कि यहाँ रामचन्द्र आए हुए हैं तो वे रामके दर्शनार्थ वहाँ आए । रामन उनकी पूजा की । पश्चात् तस्वमे सुन्दर आसनपर विराजमान होकर मुनिन रामसे कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मगध देशम गङ्गाके दक्षिणी तटपर मेरा एक परम रमणीक आश्रम है । १९ ॥ परन्तु मेरे उस आश्रमम मगध देशके दून फल-मूल आदि लेनेम बड़ा विघ्न डालते हैं । इसलिए आप उन विघ्नोंसे मेरी रक्षा करें । २० । च्यवनकी बात सुनकर रामने धनुषका टंकोर करके एक बाण छोड़ा। जिससे च्यवन आश्रमके चारो ओर खाईके समान गहरा लकीर खिंच गयी, जिसको लांघना उन दूतोंके लिए असंभव हो गया। जहाँ रामके बाणकी रेखा खिंची थी, वहाँपर "राम-रेखा" नामकी सुन्दर नगरी बसी और रामरेखा नामकी नदी भी प्रवर्तित हो गयी । इसके बाद च्यवनऋषि प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीसे बोले-॥ २१-२३ । हे रघुनन्दन ! अभी कीकट देश निन्द्य माना जाता है । आपके कहनेसे यह भी पुण्यस्थान अवश्य बन जायगा। इसलिए आप मुझे सुख देनेवाला कोई वचन आज कहें । मुनिके इस वचनको सुनकर रामजीने महर्षि कहा -॥ २४ । २५ । हे मुनीश्वर ! मेरे कहनेसे कीकट देशमे गया, पुनपुना नदी, आपका आश्रम तथा राजनन् (गजागृह) पुण्यस्थल होंगे। इसम आप कुछ भी संदेह न मानें । श्रीभगवान्‌के इस कथनसे संतुष्ट होकर च्यवनऋषि रामजी से आज्ञा लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके बाद रामजीके द्वारा स्थापित अन्नसत्रमें प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मण और यति भोजन करने लगे । २८ ॥ ऐसा होनेपर एक दिन गङ्गायात्राके प्रसङ्गम कुम्भोदर नामके मुनि प्रयागसे रामजीकी भोजनशालाके लिए नियत की हुई सीमापर आये । वहाँ दूतोंको देखकर वे बोले-हे दूतो !