भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 200
१८४आनन्दरामायणे[ सर्गः ५

मंत्रिमित्रैर्बन्धुभिश्च वसिष्ठेन पुरोधसा । मन्त्रयित्वा मुनेर्वाक्यं सत्यं मेने रमापतिः ॥४९॥ ततो निश्चितवान् रामः सभासंस्थे पुरोधसा । आदौ कार्या तीर्थयात्रा यज्ञः कार्यास्ततः परम् ॥५०॥ ततो रामाज्ञया दूता गत्वाऽयोध्यां पुरीं प्रति । तद्वृत्तं च सविस्तारं सुमन्त्राय न्यवेदयन् ॥५१॥ सुमन्त्रोऽपि च तद्वृत्तं श्रुत्वा वस्त्रधनानि च । उष्ट्राश्वस्यनागाद्यैः प्रेषयामास सादरम् ॥५२॥ पुष्पकं च तदा प्राह रामः शक्तिस्तवास्ति हि । यद्यप्यद्य गिरा मे त्वं शीघ्रमेव यथाबलम् ॥५३॥ उष्ट्राश्वानायतीर्नीत्वा च तथोदरे । करिष्यसि सविस्तारं तथा विस्तीर्णतां व्रज ॥५४॥ सर्वथा मत्प्रसादार्थं शक्तिस्तु यथामुखम् । कस्मिन्काले सूक्ष्मरूपं महद्रूपं कदापि च । ५५॥ यथाकामा मया शक्तिस्तव दत्ता न संशयः । तच्छ्रुत्वा रामवचनं पुष्पकं शतयोजनम् ॥५६॥ समन्तस्तथोच्चं हि बभूवाथ द्वियोजनम् । शताट्टालैश्च सोपानैर्हेमरत्नोद्भवैःश्रितम् ॥५७॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं नानाधातुविचित्रितम् । कलशैः शतसाहस्रैर्हेमरत्नविभूषितैः ॥५८॥ जालरन्ध्रगवाक्षैश्च मुक्ताहारैर्विभूषितम् । कपाटैर्दर्पणैःश्चैतैर्जलयंत्रसुवेष्टितम् ॥५९॥ पुष्पाणां वाटिकाभिश्च नानापक्षिनिनादितम् । अर्धमस्तकतश्च यत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥६०॥ त्रिच्छायां मणवर्णश्च प्रभा विस्मार्यति हि । गोपुराणि च भासन्ते शतशोऽथ सहस्रशः ॥६१॥ तत्र प्राथमिकार्या तु पंक्तौ श्रीराघवज्ञया । उष्ट्राश्वरथनागादीन् दूताश्चारोहयंस्तदा ॥६२॥ द्वितीयायां काष्ठचयान् तृणोलूखलमुसकान् । तृतीयायां धान्वराशीन् पात्राण्यन्नानि वै ततः । ६३॥ पञ्चम्यां तु शतघ्नीश्च ततः सुशस्त्रमनेकशः । तत्र ऊर्ध्वं राजवाहानथश्रेष्ठवरवणान् ॥६४॥ अष्टमायां राजकोशान् वस्त्रधान्यादिनिर्मितान् । हट्टशालास्ततः श्रेष्ठा दासीदासांस्ततः परम् ॥६५॥ भटादीनां ततः शाल्य वाग्मीणां ततः परम् । ततो वीरानधिपांश्च तेभ्यः श्रेष्ठांस्ततः परम् ॥६६॥ गच्छति दुर्गार्यै तान् पञ्चदशार्यपना ततः । रथयोग्यांश्चनोऽत्युच्चैर् गजांश्चैव ततः परम् ॥६७॥


सभामें मुसकाते हुए कहो ॥ ४८ ॥ मंत्रियो, बन्धुओ तथा पुरोहित वसिष्ठजीके साथ परामर्श करके रमापति रामचन्द्रजीने मुनिके वाक्यको सत्यसम्मत माना ॥ ४९ ॥ इसके बाद सभामें पुरोहितके साथ परामर्श करके रामचन्द्रजीने निश्चय किया कि पहले तीर्थयात्रा और उसके बाद यज्ञ करना चाहिए ॥ ५० ॥ ऐसा निर्णय हो जानेके बाद रामचन्द्रजीकी आज्ञामें दूतने अयोध्या जाकर मन्त्री सुमन्त्रसे सब हाल विस्तारपूर्वक कहा । सुमन्त्रने भी उस समाचारको सुनकर सादर वस्त्र-धन आदि ऊंट, घोड़ा, रथ और हाथी आदिपर लदवा-कर रामजीके पास भेजा ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ तब रामने पुष्पकविमानसे कहा—तुम्हारेमें अपार शक्ति है । अतएव तुम अपने बलके अनुसार विस्तृत बनो । यद्यपि तीर्थयात्राके समय ऊंट, घोड़ा, रथ और हाथी आदि की तुम्हारे अन्दर ही निवास करेंगे ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ कामके अनुरूप अर्थात् जैसा कार्य हो, वैसा तुम्हारा रूप भी हो जाय । ऐसी शक्ति तुम्हें मैने दी है । इसमे संशय नहीं है । रामजीके इस वचनको सुनकर सो अट्टालिकाओं और सोने तथा रत्न आदिकी सीढ़ियोंवाला, करोड़ों सूर्योंकी कान्तिवाला, अनेक प्रकारकी धातुओंसे चित्रित, सुवर्ण तथा रत्नजटित सहस्रशः कलशसे युक्त, मोतियोंके द्वारा विभूषित, खिड़कियों तथा चिकोंसे युक्त, काचके फाटकों तथा सैकड़ों फव्वारोंसे शोभित भिन्न-भिन्न प्रकारके पक्षियों द्वारा कलरवित, पुष्पवाटिकाओंसे मण्डित, जिनमें सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें प्रधान द्वार भासित हो रहे थे, इस प्रकार वह पुष्पकविमान सर्वविध साधनोंसे सम्पन्न, शत योजन लम्बा तथा दो योजन ऊंचा हो गया ॥ ५५-६१ ॥ ऐसा हो जानेपर भगवान् रामचन्द्रकी आज्ञासे दूतोंने पहली पंक्ति की अट्टालिकामें ऊंट, घोड़, रथ तथा हाथी आदिको चढ़ा दिया । दूसरी पंक्तिकी अट्टालिकामें काष्ठका ढेर तथा घास, ओखली-मूसल आदि तीसरी अट्टालिकामें अन्नसमूह, चौथेमें भोजनालयके पात्र, पाँचवींमें तोप आदि, छठीमें अन्य विविध प्रकारके शस्त्र, सातवीं अट्टालिकामें राज-घरानेके वाहन, आठवींमें राजकोष, नवों अट्टालिकामें वस्त्र-धन आदिसे युक्त श्रेष्ठ बाजार, दहवों अट्टालिकामें