श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९] यागकाण्डम् २४५
सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः ।
द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम् ॥५६॥
सीतया च महाराजः सुवासाः साध्वलंकृतः । भ्रातृभिः सेव्यमानः स विरजेऽग्निरिवापरः ॥५७॥
तस्मै जहार धनदो हैमं वीरवरासनम् । वरुणः सलिलस्रावि सातपत्रं शशिप्रभम् । ५८।
वायुश्च बालव्यजने धर्मः कीर्तिमयीं सजम् ।
इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमन यमः । ५९॥
ब्रह्मा अक्षयमयं वर्म भारती हारमुत्तमम् । दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रमथास्विका । ६०॥
सोमोऽमृतमयान्कुम्भांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम् । अग्निरराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिक्षून् ॥६१॥
भूः पादुके योगमयी द्यौः पुष्पावलिपन्नहम् ।
नाट्यं सगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचराः । ६२॥
ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्खमाम्बुजम् । सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः ॥६३॥
ततो ददुर्नृपाः सर्वे स्पन्दनांस्तुरगान् गजान् । शिविकागोवृषान् खड्गान् दासीर्दासांस्तथोष्ट्रकान् ॥६४॥
सीतायै नृपपत्न्यश्च देवपत्न्यः सहस्रशः ।
वस्त्रालङ्कारयानानि माङ्गल्यान्यथ कंचुकीः ॥६५॥
क्रीडोपकरणादीनि ददुस्ताः पक्षिंपजग्रन् । ततस्तैः पूजित सर्वैः सीतया रघुनायकः ॥६६॥
आरुरोह रथ दिव्यं वन्दिना वन्दिभिः स्तुतः । स्वस्वांभिनृपपत्नीविमानेन मुनीश्वराः ॥६७॥
त्रिदिवस्यः ययुः सर्वेऽयोध्यायां नृपतेर्गृहम् ।
ततो रामो रथेनैव पूर्वोक्तेनरुपेः शनैः ॥६८॥
विवेश नगरीं रामः स्तुतः सूतैश्च मागधैः । छत्रं दधार सौमित्रिर्मुक्ताजालविराजितम् ॥६९॥
भरतस्तालव्यजनं शत्रुघ्नश्चामरद्वयम् । ताम्बूलपात्रं सुग्रीवस्तोयपात्रं तु वायुजः ॥७०॥
नलः हीभनपात्रं च वालिजो मुकुरं वरम् ।
वामःकोशं राक्षसेन्द्रो धूपपात्रं हि जाम्बवान् ॥७१॥
पूजन किया। संसारकी नदियां, पर्वत, समुद्र, हाथी, घोडे, मृग, पक्षी, आकाश और पृथ्वीपर रहनेवाले सब प्राणियोंने अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार भगवान्को भेंट दी। उस समय रामचन्द्रजी सीताजीके साथ सिंहासनपर बैठे हुए थे। चारों भाई उनकी सेवामे तल्लीन थे। रामचन्द्र उस समय दूसरे अग्निके सदृश देदीप्यमान दीख रहे थे। ५५-५७। उस समय भगवान्को कुबेरने एक सोनेका सिंहासन दिया। वरुणदेवने जलकी वर्षा करनेवाले और चन्द्रमाकी नाईं उज्ज्वल छत्र दिया। वायुने चमर दिया। धर्मराजने माला दी। इन्द्रने एक बहुमूल्य किरीट दी। यमराजने दण्ड दिया। ब्रह्माने कवच दिया। सरस्वतीने हार दिया। उसी तरह रुद्रने दस बारदानी एक तलवार, पार्वतीजीने शतचन्द्र तलवार, चन्द्रमाने अमृतभरे घड़े, त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने एक सुन्दर रथ, अग्निने अग्निकी तरह चमकता हुआ आजगव नामक एक धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने योगमयी पादुकाएँ, आकाशने फूलोंके ढेर, गन्धर्वोंने नाच-गाने-बाजे आदि, ऋषियोंने सत्य आशीर्वाद, समुद्रने शंख, नदियों तथा बड़े-बड़े नदों और पर्वतोंने भगवान्को रथके रास्ते दिये। ५८-६३॥ इसके अनन्तर राजाओंने रथ, हाथी, घोड़े, पालकी, गाय, बैल, खड्ग, दास और ऊँट आदिके उपहार दिये। फिर राजाओंकी रानियों और देवताओंकी देवियोंने नाना प्रकारके वस्त्र-आभूषण, रामकी आदि माङ्गलिक वस्तुयें, खेलके सामान, बोलनेवाले सुन्दर पक्षियोंके पिंजरे आदि सीताको दिये। इस तरह सीताके साथ रामचन्द्र सबसे पूजित होकर एक दिव्य रथपर सवार हुए और वन्दीजनोंने भगवान्की स्तुति आरम्भ की। बहुतेरे मुनिजन अपनी स्त्रियों और राजाओंकी स्त्रियोंके साथ विमानपर चढ़कर