भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 276
२६०आनन्दरामायणे[ सर्ग २

ऊर्ध्वाधरः कोमलस्ते रक्तवर्णो विभाव्ययम् । ऋजु घ्राणमुन्नसं ते दिव्यं भाति मनोहरम् ॥६१॥
तव नेत्रे कंजपत्रतुल्ये दीर्घे मनोहरे । हरिणानेत्रसदृशे कामबाणान्विव प्रिये ॥६२॥
तव कर्णौ घनौ पीनौ बहुभारमहौ वरौ । तव सीतेऽतिसुस्निग्धे प्रोच्चे गंडस्थले शुभे ।६३।
कृशे भ्रुवौ चापतुल्ये कृष्णवर्णे सुकोमले । ललाटं तव विस्तीर्णं मांसलं हि समं मृदु ।६४।
गङ्गाकूलोपमः सीते सीमन्तस्तव सुंदरः । हेमवत्प्रतभानास्ते केशाः स्निग्धाः सुकोमलाः । ६५ ।
मस्तकस्तव सूक्ष्मश्च वर्तुलो मांसलः शुभः । वेणीबन्धो वरः सीते जघने पतितस्तव ।६६।
चंपपुष्पोपमो वर्णः सौकुमार्यमपि प्रिये । माते त्वानानस्पर्द्धा शशांकः क्षयमाप सः ॥६७॥
त्वन्नेत्रविजिता सीते मृगी धावति कानने । सीते त्वद्भ्रुकुटिस्पर्द्धि चाप भग्नं मया पुरा ॥६८॥
तव नेत्रकटाक्षेण मुनीनां मदनोद्भवः । नेत्रयोश्च चांचल्यं मकरान् लज्जयत्यहो ।६९॥
तव नासं शुको दृष्ट्वाऽऽत्मानं धिक्करोति हि । दृष्टिष्टयोः श्रोणिमी ते सौकुमार्यमपि प्रिये ॥७०॥
सहकारतरोश्चापि रक्तः कोमलपल्लवः । लज्जया हरितो भाति त्यक्त्वा स्त्रीयां सुरक्तताम् । ७१ ।
सौकुमार्यं तथा त्यक्त्वा लज्जया तेयतोऽपिसः । एवं किं कि मया कान्ते सौदर्यं तव जानकि ।७२॥
वर्णनीयं महद्दिव्यं तत्र ब्रह्माऽपि कुंठितः । इत्युक्त्वा राघवः सीतां प्रीतया तां परिषस्वजे ।७३।
तच्छ्रुत्वा वर्णनं स्वाय लज्जयाऽधः कृतानना । किंचिन्स्मितताननं कृत्वा तस्याथंके पवेश सा ।७४॥

इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये सीतावर्णनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


चित्रकारी की हुई है। इससे वे और भी सुन्दर मालूम होते हैं ॥ ६० ॥ तुम्हारा ऊपरका होठ भी कोमल और रक्तवर्ण है। कोमल और ऊँची तुम्हारी नासिका है, जो बड़ी सुन्दर दीखती है । ६१ । कमलकी पंखड़ियोंकी नाईं सुन्दर तुम्हारे दोनों आंख हैं। उन्हें चाहे हरिणीके नेत्रोंकी तरह कह लो या कामबाणकी भाँति चित्ताकर्षक कहो । ६२ ॥ तुम्हार दोनों कान भा घन और पीन हैं। वे बहुतसे गहनोंका बोझ सह सकते हैं। तुम्हारे गंडस्थल अति कोमल और ऊंचे हैं । ६३ । पतली-पतली और काले रंगकी तुम्हारी दोनों भौंह धनुषाकार दीखती हैं तुम्हारा ललाट खूब चौड़ा और बराबर है ॥ ६४॥ तुम्हारी माँग गंगाके तटकी तरह सुन्दर दीखती है। सोनेके तारकी भाँति सुन्दर, चिकन और कोमल तुम्हारे केशोंका कलाप है ॥ ६५ ॥ तुम्हारा मस्तक सूक्ष्म, वर्तुल, मांसल और सुन्दर है। तुम्हारे केशोंका वेणीबन्ध जंघनतक झूलता है ॥ ६६ ॥ चम्पाके फूलकी तरह तुम्हारा सुन्दर वर्ण है। उसी तरह उसमें कोमलता भी है। हे सीते ! तुम्हारे मुखसे होड़ करनेके कारण चन्द्रमाको क्षयरोग हो गया ॥ ६७ ॥ तुम्हारी आँखाम हार मानकर मृगियों वनको भाग गयीं और इधर-उधर दौड़ती फिरती हैं। हे जनकात्मजे सच पूछो तो उस समय धनुषयज्ञमें तुम्हारी इन भौंहोंसे स्पर्धा करनेके ही कारण मैंने धनुषको तोड़कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे ॥ ६८ । मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारे नेत्रोंके कटाक्षसे बड़े बड़े तपस्वियोंके हृदयम भी कामका वेग प्रादुर्भूत हो जायगा। तुम्हारे नेत्राकी चंचलता मछलियोंको भी मात कर रही है तुम्हारी नाक देखकर तोते अपनेको बार बार धिक्कारते हैं। तुम्हारे होठोंकी लालिमा ओद कोमलता देखकर आम्रवृक्षका लाल और नया पत्ता लज्जाके मारे हरा हो गया है। तुम्हारी लालिमाके आगे उसकी लालिमा नहीं ठहर सकी। हे कान्ते ! मैं तुम्हारी सुन्दरताका कहाँ तक वर्णन करूँ, ६९-७२ ॥ इसके वर्णनमें चतुर्मुख ब्रह्मा भी हार मान लेंगे। ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने सीताको अपने हृदयसे लगा लिया ॥ ७३ ॥ इस तरह अपनी बड़ाई सुनकर सीता भी लज्जासे नीचा मुंह करके बैठ गयीं। फिर थोड़ा मुसकाकर पतिदेवकी गोदन जा बैठीं ॥ ७४ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकायां सीतावर्णनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥