भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२६२ अलिन्दरामायणे [ सर्ग ३

नामव्याप्तिश्च मायाया वियोगश्च ततः स्मृतः । सुखाभावो महाक्लेशः शोकभग्नस्ततः परम् ।।१५।। विवेकस्याश्रयस्तत्र मत्स्मृतेश्च समागमः । अविवेकवधश्चापि सुन्मुखेन समागमः ।।१६।। अज्ञानतन्मोहश्च त्रिगुणाश्रयवर्त्तनम् । लिङ्गत्रयनिग्रहस्तत्र मदस्य स्मृतिकीर्त्तनम् ।।१७।। निग्रहो मन्मथस्यापि तमोऽहंकारनिग्रहः । वियोगो लिङ्गदेहस्य मायाशर्मव्यहा हतः ।।१८।। हृदयाकाशगमनमानन्दैकसुखं ततः । मायान्यामलसत्त्वैश्च सान्निध्यस्य ग्रणं स्मृतम् ।।१९।। शान्त्विक्या मायया सार्ध हृदयाकाशमुत्तमम् । महाकाशे प्रगयनं सच्चिदानन्दसंग्रहे ।।२०।। प्रवेशनं सागर हि मुक्तिर्ब्रह्माण्डमनः शुभा । सायुज्या सा परित्रेया मुक्तिर्मुक्तेश्वतुष्टये ।।२१।। एवं मयेय मे प्रोक्ता सीते सञ्ज्ञानपेटिका । वेदरत्नैर्गूढार्थैश्चामलमविनाशकैः ।।२२।। मन्वानन्दैः पंचदशश्लोकरत्नैः प्रपूरिता । मयार्पिता गृहाण त्वमस्यां बुद्ध्याऽवलोकय ।।२३।। भविष्यति मम ज्ञानमस्याः सम्यग्विचारतः । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता संज्ञानपेटिकाम् ।।२४।। निजहृन्मन्दिरे स्थाप्य बुद्धिवृष्ट्या मुहुर्मुहुः । मय्यनुद्धातय तूष्णीं मा मुहुर्त्तमवलोकयत् ।।२५।। तदा ज्ञात्वऽथ सकलां निजक्रीडां विदेहजा । विहस्य रघुशिष्यं मा ननाम्रांघ्रिपकंजे ।।२६।। आनंदनिमग्ना जाता सानराघवसन्विता । आनशेन्दुर्मुखीमाद्धा तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ।।२७।। आनन्दनिव्भैरीं सीतां दृष्टा तां राघवोऽब्रवीत् । पेटिकाया त्वया सीते किं दृष्टं तोषकारकम् ।।२८।। कच्चिद्रत्नं ददृश्यारं कच्चिच्छुद्धं मम त्वया । सत्वानं वद मां सीते यथा ज्ञातं त्वया हृदि ।।२९।।

माया अलगभित्र रहती है ॥ १३ ॥ १४ ॥ तब तमोगुणयो मायाका वियोग हो जाता है। इसमें सुखका नाम नही रहता और चारो ओर केवल दुःखकी घटाएं घिरी दिखाई देती हैं। उसके आगे शोकभग्नका दर्जा आता है ॥ १५ ॥ उसी समय हृदयमें विवेक उपजता है। साथ ही भक्तिका भी उद्रेग होता है। अज्ञान मष्ट हो पड़ता है। उन्मादसे स्नेह हो जाता है। तीन गुणवाला इस शरीरिका सबसे प्रधान कर्त्तव्य यह है कि जिस तरह भी हो सके अज्ञानसे जबको दुःखसेवा चाककरे। जब प्राणी मदका निग्रह कर लेता है तब वह लिङ्गनिग्रह कहलाने लगता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ मन्मथ निग्रह करके मत्सरका और मत्सरके बाद अहङ्कारका निग्रह करना चाहिए। जिस समय मन्मथ लिङ्गनिग्रही हो जाता है अर्थात् मदको वशमें कर लेता है। उसी समय मायाके पराभव होनेका समय आता है ॥ १८ ॥ शब्दमय माया और है ही क्या, इन्हीं काम-आदिकोंके संघसे मायाका निर्माण हुआ करता है। इनका परास्त हो जानेपर प्राणीका आनन्द ही आनन्द रहता है। जब मायाका त्याग हो जाता है, उस समय सात्विका मायाका प्रादुर्भाव होता है। उस सात्विकी मायाके साथ प्राणी उत्पन्न हृदयाकाशका मुख अनुभव करने लगता है। उससे भी उत्कर्ष होनेपर महाकाशका निर्माण होता है । सत्, चित और आनन्द ये तीनों वहाँ सदा विद्यमान रहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ इसी महान् समुद्रम भूत कामका ज्ञानवाली कल्याणदायिनी मुक्ति कहते है । चार प्रकारकी कही हुई मुक्तियोंमेसे उसका सायुज्य युक्ति कहते हैं। हे सीते ! तुम्हारे संदेहवश मैंने यह ज्ञानका पिटारी खोलकर रख दी। इसमे गूढ अर्थवाले वेदके सात्वक परिपूर्ण तथा अज्ञानादिकोंको नष्ट करनेवाले पन्द्रह श्लोकरूपी रत्न भरे हुए हैं। इसीके द्वारा मेरा मुख्य सत्व जाना जा सकता है। यह पिटारी मैं तुम्हे अर्पण करता हूँ। इसे सम्हालो और ज्ञानदृष्टिसे देखो । बार-बार इन बातोंका मनन करो तो मुझे अच्छी तरह समझ लोगी ॥ २१-२४ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर सताने उस ज्ञानकी पिटारीको अपने हृदयमे रख लिया। फिर उसे खोलकर बुद्धिवृष्टिसे कुछ देर देखती रही ॥ २५ । तब सीता,ने अपनी सब क्रीडाओका मद जाना और हँसकर रामचन्द्रजीको प्रणाम किया ।। २६ ।। सीताको उस समय एक महान् आनन्दका अनुभव हुआ । उनकी आंखोंमें आँसू आ गये, शरीरके रोग्टे खडे हो गये और थोड़ी देरके लिए सीताजी अपने आपको भी भूलकर चुप हो गयीं ॥ २७ ॥ इस प्रकार सीताकी आनन्दित देखकर रामचन्द्रजान पूछे-हे सीते ! तुमने उस पेटीमे क्या क्या तुष्टिदायक बातें देखी ? जिससे तुम्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २८ ॥ क्यों, क्या ता तुम्हारा मज्ञान दूर