भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ६ ] विलासकाण्डम् २७७

उपबर्हणसंस्पृष्टः सीतारामाश्रितो मुदा । हस्त्यश्वोष्ट्रमृगैर्गजदन्तैः कृत्रिमनिर्मितैः ॥ ११॥ हेमरत्नहस्तिदन्तमधुरैर्गजचित्रितैः । क्रीडो मृदुवनेनैव चकार सीतया सुखम् ॥ १२॥ ततः पक्षिगणैः सर्वैः पञ्जरस्थैः समानया । क्रीडां चकार श्रीरामौ दासीभिर्वीजितो मुहुः ॥ १३॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतयाऽऽकारिताः पुरः । समावपुर्वरनार्यो ननृतुः शतशस्तदा ॥ १४॥ चक्रुर्गीतं सुस्वरं ताः षड्जस्वरमयन्वितम् । ततस्ताभ्यो ह्यलङ्कारान् दत्त्वा स्वमञ्चितं जनकी १५॥ विसर्जयामास ताः सर्वास्ततो राममब्रवीत् । स्थिता प्रासादपर्येऽद्य कौतुकं द्रष्टुं त्वया ॥ १६॥ द्रष्टुमिच्छाम्यहं राम शीघ्रमुत्तिष्ठ गच्छ । तत्सीतासहितोरामः प्रासादं प्रति नीतया ॥ १७॥ गत्वा दिव्यासने स्थित्वा गवाक्षे रुक्मभूषितेः । रत्नोद्भवकपाटैश्च मुक्ताजालविराजिते ॥ १८॥ राजवीथ्यां दृष्टवान् दृश्यं जनौघौसुकम् । सीतायै दर्शयामास कौतुकानि स राघवः ॥ १९॥ स्वीयदक्षिणहस्तस्य तर्जन्या मुदिताननः । एतस्मिन्नन्तरे दृष्टे द्विजपत्नी तु सीतया ॥ २०॥ दृष्ट्वालङ्कारवस्त्रार्थैर्रहीना कटिपृष्ठायका । गच्छन्ती राजमार्गेण कृशा भिक्षार्थमुद्यता ॥ २१॥ तां तादृशीं निरीक्ष्याथ दास्याह्वय विदेहजा । प्रप्रच्छ भूषणाद्यैस्त्वं किमर्थं रहिता ह्यसि ॥ २२॥ सा प्राह तीर्थयात्रार्थ त्यक्त्वा मां तानकालिना । गतोगेहे गतो भर्ता ततोऽपि जरठो मृतः ॥ २३॥ गुरुगेहेऽवंतिकायां वर्त्तते भ्रातरो मम । न पोषकः कोऽपि गेहेऽधुना सीतेऽस्ति वै मम । २४॥ तस्मान्न सन्त्यलङ्कारावासांसि जनकात्मजे । इति तस्या वचः श्रुत्वा रामरूप सन्निरीक्ष्य सा २५॥ निजालङ्कारवासांसि ददौ तस्यै विदेहजा । ब्राह्मणी सा पुनः प्राह गच्छ त्वं लक्ष्मणं प्रति ॥ २६॥ हेममुद्रा लक्ष्मितस्त्वं गृहाण शमतपा । तथेति जानकी पृष्टा सा ययौ लक्ष्मणं तदा ॥ २७॥

६ ॥ १० ॥ रामकी पीठपर तकिया लगा था और सीता रामके वामभागमें बैठी थीं। वहाँ नकली हाथी, घोड़े, ऊँट मृगी और राजदूत आदिके खिलौने रक्खे हुए थे इनके साथ राम तथा सीताने बहुत देरतक खेल-कूद किया। इनमे बहुतसे खिलौने सुवर्ण, हाथीदाँत एवं रत्नोंके बने हुए थे और उनपर बढ़िया नक्काशी की हुई थी ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर पिंजड़ामें बैठे हुए बहुसंख्यक पक्षियोंके साथ रामने क्रीड़ा की उस समय भी रानियाँ पंखा झल रही थीं ॥ १३ ॥ इसके बाद सीता द्वारा बुलाई हुई बहुसंख्यक नर्तकियाँ आकर वहाँ नाचने-गाने लगीं । १४ ॥ वे सबबार षड्जस्वरमय सुन्दर गीत गा-गाकर बहुत देर तक उन्हें लुभाती रहीं। इसके बाद सीताने उनको बहुतसे वस्त्र-अलंकार आदि देकर विदा किया ॥ १५ ॥ उनको विदा करके सीता रामसे कहने लगीं - आज हमारी यह इच्छा है कि आपके साथ छतपर बैठकर बाजारका कौतुक देखूँ ॥ १६ ॥ उत्तिए और जल्दी चलिए। तदनुसार राम सीताके साथ प्रासादपर गये । १७ । वहाँ एक दिव्य आसनपर बैठकर स्वर्णके बने हुए झरोखोंमें जिसमें विविध प्रकारके रत्नोंके दरवाजे लगे थे और मोतियोंकी झालरें लटकी हुई थीं ॥ १८ । उनमेंसे ही वे राजमार्गके जनसमुदायका कौतुक देखने लगे और सीताको भी दाहिने हाथकी तर्जनी अंगुलीके संकेतसे दिखाने लगे ॥ १९ ॥ इसी बीच सीताने देखा कि एक ब्राह्मणकी पत्नी वस्त्र, अलङ्कारकी त्यागे नङ्गी चली आ रही है। उसकी कमरपर एक बच्चा है, उसकी दुबली-पतली देह है और उसके हावभावसे मालूम पड़ता है कि वह भिक्षा माँगनेके लिए बाजार आयी है ॥ २० ॥ २१ ॥ उसकी यह दशा देखकर सीताने दासी द्वारा उसे अपने पास बुलवाया और पूछा कि तुम इस तरह बिना वस्त्र और आभूषणके हजारमें किसलिए घूम रही हो ? ॥ २२ ॥ उसने कहा कि मेरे पतिदेव घरमें मुझे अकेली छोड़कर तीर्थयात्राके लिए चले गये। मैं अपने पिताकी बड़ी दुलारी बेटी थी । इसलिए अपना घर छोड़कर पिताके पास गयी तो वहाँ पिताजी वृद्धावस्थाके कारण परलोक चले गये थे ॥ २३॥ अवन्तीपुरीम मेरे पिताके कई छोटे छोटे बच्चे अर्थात् मेरे भाई हैं, किन्तु मेरा तथा बच्चोंका पालन करनेवाला इस संसारमें कोई नहीं है २४ ॥ इसी कारण हे जनकात्मज ! मेरे पास वस्त्र और आभूषण नहीं हैं जिन्हें मैं पहनूँ। इस प्रकार उसकी बातें सुनकर सीताने एक बार रामको ओर देखा और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर उस विप्रपत्नीको